ये भी ठीक ही है

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Sunday, February 24, 2013

खरीददारी

 February 24, 2013     hasya, khariddari, manu shrivastav, manushrivastav, turkash, turkash.blogspot.in, vyang, खरीददारी, व्यंग, हास्य     No comments   


ग्राहक  -  भाई साहब ये मूर्ति कितने की है?
दुकानदार -  तीस रुपये की।

ग्राहक  -  दो मूर्ति पचास की दोगे ?
दुकानदार -  नहीं, इतना फायदा नहीं होता है। हाँ, अगर तीन मूर्ति खरीदोगे तो अस्सी का दे सकता हूँ।

ग्राहक  -  तीन मूर्ति अस्सी का दोगे ? यानी ज्यादा लेने पर दाम थोडा कम कर करोगे।
दुकानदार - हां, मुनाफा तो कम होता है लेकिन थोक में माल निकल जाता है वैसे।

ग्राहक -  और अगर मैं छह मूर्तियाँ लेता हूँ, तो क्या 140 का दोगे ?
दुकानदार -  छह मूर्ति 140 का? ह्म्म्म्म ठीक है।

ग्राहक  -  140 में छह मूर्ति दोगे, तो एक मूर्ति का दाम  23 रुपया हुआ। तो ऐसा करो की दो रुपया और लगा के पच्चीस के हिसाब से दो मूर्ति पचास में दे दो।

दुकानदार - नहीं भाई, इतना फायदा नहीं है, मूर्ति के धंधे में। 
ग्राहक  - लेकिन आप हिन् बताओ की मैं छह मूर्ति लेकर करूँगा क्या। थोडा तो सस्ता करो आप।

दुकानदार - इससे सस्ता और कहीं नहीं मिलेगा आपको, चाहो तो पता कर लो आप।
ग्राहक  -  अब खरीदने आपके पास आया हूँ तो कहीं और पता क्या करना है? पाँच मूर्ति लूँ तो कितने का दोगे ? 

दुकानदार - पांच मूर्ति एक साथ लोगे तो 120 का दे दूंगा। थोक के भाव पर।
ग्राहक  -  अरे भाई पांच मूर्ति को 120 में दोगे तो एक मूर्ति कीमत 24 रुपये हुई न। मुझे दो हि मूर्ति चाहिए। आप 24 रुपये के साथ एक रुपया और जोड़ लो और पच्चीस के हिसाब से दो मूर्ति दे दो।

दुकानदार -  नहीं दे सकता हु, फायदा नहीं है, थोक भाव में बेचने पर भी फायदा नहीं है, बस मेरा माल निकल जायेगा इसलिए मैं इसे 120 में 5 मूर्ति देने को तैयार हु।

ग्राहक  -  लेकिन मैं पांच लेकर करूँगा क्या? अच्छा सही सही रेट लगा दो, अगर तीन हीं  लेलु तो कितने का दोगे ?
दुकानदार - लास्ट रेट बता रहा हूँ। 3 मूर्ति को 75 से कम में नहीं दूंगा।

ग्राहक  - 75 में तीन मूर्ति दोगे ? यानी एक का दाम पच्चीस रुपये। ठीक है मंजूर है, दो मूर्ति दे दो। ये लो पचास रुपये।
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