सोसाइटी के सफाई वाले अकसर परेशान रहते हैं. आगे झाड़ू लगा रहे होते हैं. पीछे साफ किये जगह में कुत्ते लोटने लगते हैं. कुत्तों के लोटने से जगह फिर से कितनी गन्दी होती है, नहीं पता. लेकिन सफाई वालो को कुढ़न जरुर हो जाती है.
वैसे कुत्ते भी जहाँ बैठते हैं फूंक मार कर के बैठते हैं. फूंक मार कर के बैठने से तात्पर्य है की बैठने की जगह साफ़ कर के, बैठते हैं. और जब सफाई की हुई जगह मिल रही हो बैठने के बजाय, लोटने में हर्ज है. ऐसा शायद कुत्तों की सोंच होगी.
घर के दरवाजे पर रखे डोर मेट पर अक्सर एक पिल्ला आकर बैठ जाता है. ठण्ड का मौसम है. ठन्डे फर्श पर बैठने से बेहतर होगा, डोर मेट पर हीं सिकुड़ कर बैठ जाया जाये. छोटे से डोर मेट पर वो पिल्ला अपने बदन को ठीक वैसे हीं सिकोड़ - मिकोड कर बैठता है, जैसे रेल के बहत्तर सीटों वाले जनरल डब्बे में, दो तीन सौ लोग समाये होते हैं.
बगल से गुजरने पर, भले उसकी आँख बंद रहे, उसकी पूंछ खुद ब खुद हिलने लगती है. मेरे हिसाब से पूछ हिलाने के दो कारण हो सकते हैं. एक, की सामने वाले को दया आ जाए और ठण्ड में उसे उस जगह से ना भगाये, जिस जगह को काफी देर से बैठ कर उसने गरम किया है. और दुसरे कारण के लिये पहला कारण हीं पढ़ ले.
सिटी की आवाज देने पर पैरों के पास आकर कूदने लगना उसकी आदत है. खैर एक बात मैंने नोटिस की है, कुत्ता चाहे की हीं क्यों ना भौंक रहा हो, आप अपने ओठ गोल कर के सिटी बजायेंगे तो वो भौंकना छोड़ कर अपनी पूंछ हिलाने लगेगा. मैंने ये निष्कर्ष निकाला है, सिटी की आवाज की तरंगधैर्य कुत्तों को मोहित कर लेती होंगी.
घर के दरवाजे पर कुत्ते को पालना एक प्रचलित मान्यता है. मगर अपार्टमेंट कल्चर में दरवाजे के बाहर देसी कुत्ते नहीं, दरवाजे के अन्दर विदेशी कुत्ते पाले जाते हैं.
वो पिल्ला दिए गये खाने के सामान को अपने मर्जी के हिसाब से खाता, छोड़ता या छिन्टता है. खाने के बाद अपनी मर्जी के हिसाब से किसी कोने में टट्टी भी करता है. अब ये कूड़ा उठाने वाले को कूड़ा उठाने के पहले देखना है, की गिला है या सुख चूका है.
खैर, गिला हो या सुखा, कुत्ते की टट्टी उठा कर फेंकने के नाम पर हंगामा मचना हीं है. कभी कभी मच भी जाता है. कूड़ेवाली कहती है, ये कुत्ता बहुत हरामी है, जहाँ तहाँ हग देता है. मतलब बाकी के कुत्तों का बाप कौन है, इसको सही सही पता है.
कूड़ेवाली कूड़ा ले जाने से मना ना कर दे, उससे बेहतर है उस पिल्लै को यहाँ से भगा दिया जाये. कभी किसी दरवाजे से , कभी किसी दरवाजे से लोग उसपर पानी फेंकते रहे. वो भींगता, कांपता, धुप में जाकर सूखता रहा.
अब वो कहीं नजर नहीं आ रहा है.
कुत्तों को रहने को जगह नहीं मिलती, इंसानों के मोहल्ले में.
वैसे कुत्ते भी जहाँ बैठते हैं फूंक मार कर के बैठते हैं. फूंक मार कर के बैठने से तात्पर्य है की बैठने की जगह साफ़ कर के, बैठते हैं. और जब सफाई की हुई जगह मिल रही हो बैठने के बजाय, लोटने में हर्ज है. ऐसा शायद कुत्तों की सोंच होगी.
घर के दरवाजे पर रखे डोर मेट पर अक्सर एक पिल्ला आकर बैठ जाता है. ठण्ड का मौसम है. ठन्डे फर्श पर बैठने से बेहतर होगा, डोर मेट पर हीं सिकुड़ कर बैठ जाया जाये. छोटे से डोर मेट पर वो पिल्ला अपने बदन को ठीक वैसे हीं सिकोड़ - मिकोड कर बैठता है, जैसे रेल के बहत्तर सीटों वाले जनरल डब्बे में, दो तीन सौ लोग समाये होते हैं.
बगल से गुजरने पर, भले उसकी आँख बंद रहे, उसकी पूंछ खुद ब खुद हिलने लगती है. मेरे हिसाब से पूछ हिलाने के दो कारण हो सकते हैं. एक, की सामने वाले को दया आ जाए और ठण्ड में उसे उस जगह से ना भगाये, जिस जगह को काफी देर से बैठ कर उसने गरम किया है. और दुसरे कारण के लिये पहला कारण हीं पढ़ ले.
सिटी की आवाज देने पर पैरों के पास आकर कूदने लगना उसकी आदत है. खैर एक बात मैंने नोटिस की है, कुत्ता चाहे की हीं क्यों ना भौंक रहा हो, आप अपने ओठ गोल कर के सिटी बजायेंगे तो वो भौंकना छोड़ कर अपनी पूंछ हिलाने लगेगा. मैंने ये निष्कर्ष निकाला है, सिटी की आवाज की तरंगधैर्य कुत्तों को मोहित कर लेती होंगी.
घर के दरवाजे पर कुत्ते को पालना एक प्रचलित मान्यता है. मगर अपार्टमेंट कल्चर में दरवाजे के बाहर देसी कुत्ते नहीं, दरवाजे के अन्दर विदेशी कुत्ते पाले जाते हैं.
वो पिल्ला दिए गये खाने के सामान को अपने मर्जी के हिसाब से खाता, छोड़ता या छिन्टता है. खाने के बाद अपनी मर्जी के हिसाब से किसी कोने में टट्टी भी करता है. अब ये कूड़ा उठाने वाले को कूड़ा उठाने के पहले देखना है, की गिला है या सुख चूका है.
खैर, गिला हो या सुखा, कुत्ते की टट्टी उठा कर फेंकने के नाम पर हंगामा मचना हीं है. कभी कभी मच भी जाता है. कूड़ेवाली कहती है, ये कुत्ता बहुत हरामी है, जहाँ तहाँ हग देता है. मतलब बाकी के कुत्तों का बाप कौन है, इसको सही सही पता है.
कूड़ेवाली कूड़ा ले जाने से मना ना कर दे, उससे बेहतर है उस पिल्लै को यहाँ से भगा दिया जाये. कभी किसी दरवाजे से , कभी किसी दरवाजे से लोग उसपर पानी फेंकते रहे. वो भींगता, कांपता, धुप में जाकर सूखता रहा.
अब वो कहीं नजर नहीं आ रहा है.
कुत्तों को रहने को जगह नहीं मिलती, इंसानों के मोहल्ले में.
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