ये भी ठीक ही है

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Wednesday, February 12, 2014

सेक्सोलॉजिस्ट (A)

 February 12, 2014     abhishek ranjan., facebook, google, manoranjan, manoranjan shriavstav, manu, manu shrivastav, sexologist, turkash, turkash.blogspot.in     No comments   

#BichchhuGunga की विज्ञापन एजेंसी थी. बिच्छु गुंगा एक काल्पनिक नाम है. सभी उनको गुंगा जी बोलते हैं और गुंगा जी बहुत बोलते हैं.
एक विज्ञापन के सिलसिले में बिच्छु गुंगा, एक सेक्सो-लॉ-जिस्ट के पास गये थे.

डॉक्टर साब एक मरीज के साथ व्यस्त थे. हाथ के इशारे से उन्होंने बगल वाली कुर्सी पर बैठने का इशारा किया और खुद मरीज को समझाने लगे. कुर्सी पर बैठ कर गुंगा जी, डॉक्टर और मरीज की बात सुनने के लिये मजबूर थे, मजबूरन सुनने लगे.
डॉक्टर साब, मरीज को बता रहे थे, दिक्कत की कोई बात नहीं है, बस आपके शुक्राणु कम बनते हैं. दवाई लीजिये सब ठीक हो जायेगा.
गुंगा जी का ध्यान अनायास हीं उस रिपोर्ट की तरफ चला गया, जिसमे बताया गया था, अगर आप कान में इयर फोन लगा कर तेज म्यूजिक सुनते हैं, तो आपके कान के बैक्टेरिया सात सौ गुणा तेजी से बढ़ते हैं.
गुंगा जी, मरीज की तरफ इशारा कर के डॉक्टर को एक मशविरा देने लगे – आप इनको अपने अंडकोष में इयर फोन लगा कर तेज म्यूजिक सुनने के लिये क्यों नहीं बोल देते हैं. शुक्राणु सात सौ गुणा तेजी से बढ़ने लगेंगे.
गुंगा जी की बात सुन कर मरीज तो तुरंत हीं बेहोश हो बैठा, डॉक्टर साब भी अपने होश गवाँते गवाँते बचे. किसी तरह हिम्मत जूटा कर उन्होंने पूछा – मेरे इयर फोन लगाने के मरीज के शुक्राणु कैसे बढ़ेंगे?
गुंगा जी को अब समझ आया था की उनकी बात सुन कर मरीज बेहोश क्यों हो गया था. उन्होंने अपनी बात सुधार कर दुबारा से कही की, इयर फोन मरीज को हीं लगानी है. डॉक्टर साब को अब असल बात समझ में आ गयी थी. उनकी रुकी हुई सांस फिर से चलने लगी थी. बेहोश हो चुके मरीज को भी होश में लाया गया. डॉक्टर ने कुछ दवाइयाँ लिखी, मरीज चला गया.
उसके जाने के बाद एक दूसरा मरीज आया. उसने सकुचाते शर्माते अपने लिंग की समस्या बतायी.
मरीज की समस्या सुन कर डॉक्टर साब गुंगा जी के तरफ देखने लगे. गुंगा जी आँखों के इशारे में बोल रहे थे, नहीं इसको इयरफोन लगा कर तेज म्यूजिक सुनने को मत बोलियेगा.

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कुत्ते, इंसानों के मोहल्ले में.

 February 12, 2014     blogger, facebook, garbage bin, google, kuda, kutta, manoranjan shriavstav, manu, manu shrivastav, turkash, turkash.blogspot.in     No comments   

सोसाइटी के सफाई वाले अकसर परेशान रहते हैं. आगे झाड़ू लगा रहे होते हैं. पीछे साफ किये जगह में कुत्ते लोटने लगते हैं. कुत्तों के लोटने से जगह फिर से कितनी गन्दी होती है, नहीं पता. लेकिन सफाई वालो को कुढ़न जरुर हो जाती है.

वैसे कुत्ते भी जहाँ बैठते हैं फूंक मार कर के बैठते हैं. फूंक मार कर के बैठने से तात्पर्य है की बैठने की जगह साफ़ कर के, बैठते हैं. और जब सफाई की हुई जगह मिल रही हो बैठने के बजाय, लोटने में हर्ज है. ऐसा शायद कुत्तों की सोंच होगी.

घर के दरवाजे पर रखे डोर मेट पर अक्सर एक पिल्ला आकर बैठ जाता है. ठण्ड का मौसम है. ठन्डे फर्श पर बैठने से बेहतर होगा, डोर मेट पर हीं सिकुड़ कर बैठ  जाया जाये. छोटे से डोर मेट पर वो पिल्ला अपने बदन को ठीक वैसे हीं सिकोड़ - मिकोड कर बैठता है, जैसे रेल के बहत्तर सीटों वाले जनरल डब्बे में, दो तीन सौ लोग समाये होते हैं.

बगल से गुजरने पर, भले उसकी आँख बंद रहे, उसकी पूंछ खुद ब खुद हिलने लगती है. मेरे हिसाब से पूछ हिलाने के दो कारण हो सकते हैं. एक, की सामने वाले को दया आ जाए और ठण्ड में उसे उस जगह से ना भगाये, जिस जगह को काफी देर से बैठ कर उसने गरम किया है. और दुसरे कारण के लिये पहला कारण हीं पढ़ ले.

सिटी की आवाज देने पर पैरों के पास आकर कूदने लगना उसकी आदत है. खैर एक बात मैंने नोटिस की है, कुत्ता चाहे की हीं क्यों ना भौंक रहा हो, आप अपने ओठ गोल कर के सिटी बजायेंगे तो वो भौंकना छोड़ कर अपनी पूंछ हिलाने लगेगा. मैंने ये निष्कर्ष निकाला है, सिटी की आवाज की तरंगधैर्य कुत्तों को मोहित कर लेती होंगी.

घर के दरवाजे पर कुत्ते को पालना एक प्रचलित मान्यता है. मगर अपार्टमेंट कल्चर में दरवाजे के बाहर देसी कुत्ते नहीं, दरवाजे के अन्दर विदेशी कुत्ते पाले जाते हैं.

वो पिल्ला दिए गये खाने के सामान को अपने मर्जी के हिसाब से खाता, छोड़ता या छिन्टता है. खाने के बाद अपनी मर्जी के हिसाब से किसी कोने में टट्टी भी करता है. अब ये कूड़ा उठाने वाले को कूड़ा उठाने के पहले देखना है, की गिला है या सुख चूका है.

खैर, गिला हो या सुखा, कुत्ते की टट्टी उठा कर फेंकने के नाम पर हंगामा मचना हीं है. कभी कभी मच भी जाता है. कूड़ेवाली कहती है, ये कुत्ता बहुत हरामी है, जहाँ तहाँ हग देता है. मतलब बाकी के कुत्तों का बाप कौन है, इसको सही सही पता है.

कूड़ेवाली कूड़ा ले जाने से मना ना कर दे, उससे बेहतर है उस पिल्लै को यहाँ से भगा दिया जाये. कभी किसी दरवाजे से , कभी किसी दरवाजे से लोग उसपर पानी फेंकते रहे. वो भींगता, कांपता, धुप में जाकर सूखता रहा.

अब वो कहीं नजर नहीं आ रहा है.

कुत्तों को रहने को जगह नहीं मिलती, इंसानों के मोहल्ले में.

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