मैं ना दिल की बात करता हूँ, ना मन की बात करता हूँ, मैं पेट की बात करता हूँ.
मैं पेट की आग बुझाने के लिए भटकता हूँ देश के कोने होने में, जहाँ लगता है की मिल जाएगी मुझे दो रोटी. एक मेरे लिए एक घर वालों के लिए, जो इन्तजार में रहते हैं की आएगी इक रोटी दूर देश से. उस रोटी को खाकर वो खुद को तैयार करते हैं दो रोटी की तलाश में निकल पड़ने की. एक खुद खाने के लिए दूसरी घर भेजने लिए. अनवरत चलता रहा है, शायद चलता भी रहेगा यही क्रम…. Read More


