ये भी ठीक ही है

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Sunday, July 25, 2021

निब का पेन

 July 25, 2021     No comments   

निब का पेन, जो दवात पूजा के दिन खरीद कर नया मिलता था, और टारगेट रहता है था की पुरे साल इसी से लिखाई-पढाई होगी. मगर मजाल है कि वो एक महीने से ज्यादा चल सके.

पहले हफ्ते तो ठीक ठाक चलता था निब का पेन, लेकिन हफ्ता आते-आते उसमें खराबी आने लगती थी. खराबी आने के कई कारण हुआ करते थे. जैसे कि क्लास में रार-तकरार हुई तो पेन का ढक्कन खोला और घोंप दिया निब. या फिर बेंच पर हैण्डराइटिंग की प्रैक्टिस, या फिर एटसेट्रा-एटसेट्रा कारण से.

निब का पेन ख़राब होने पर स्याही बोकरने लगता था और तब स्याही को बोकरने से रोकने के लिए किसी ने बताया था कि पेन में ग्रीस लगाओ, या यूनिवर्सल तरीका है. लेकिन ये टोटका भी काम ना आता था. ग्रीस की कालिख पोतने के बाद भी स्याही की ताकत को दबाना आसान नहीं होता था, स्याही बाहर आ ही जाती थी.

स्याही बोकरने के बाद जब पेन का पेट खाली हो जाता तो उसे भर कर दांतों से टाइट करने के चक्कर में ओठ ब्लू और स्वाद कड़वा हो जाता था. गनीमत ये होती थी कि ज्यादातर नीले रंग की स्याही का इस्तेमाल होता था, पिंक या पर्पल नहीं. वरना हमारे लिप्स, सनी लियॉन वाली पिंक लिप्स या ऐश्वर्या राय वाली पर्पल लिप्स, के लिए इन्सपिरेशन का काम करते.  

बोकरती हुई स्याही वाला निब का पेन बहुत ही समाजवादी होता था. शर्ट की जेब में रखो या पेंट की जेब में, दोनों जगह एक समान ही स्याही बोकरता था और एक समान ही दाग पड़ा करते थे. और उस समय 'दाग अच्छे हैं' का जमाना नहीं था. दाग पढ़ने पर अच्छी तरह से धुलाई होती थी- शर्ट की भी, पेंट की भी और हमारी भी. और कभी गलती से पेन को किताब वाले झोला में रख लिया, जो की पुराने पैंट को रियुज करने के उद्देश्य से सिलाई कर के बनाया गया होता था, तो निब वाले पेन महोदय ऐसी उल्टी करते थे कि कॉपी-किताब सभी स्याहीमय हो जाया करती थी और फिर पता करना कि मैथ की कॉपी कौन सी है और हिंदी की कॉपी कौन सी है टॉमक्रूस के मिशन इम्पॉसिबल हो जाया करती.

घर से निकल कर स्कूल पहुँचने के बीच में, झोला को घुमा घुमा के पीठ पर लाद लिया, तो कभी उसे घुमा के सर पर रख लिया या फिर थौर के हथौड़े की तरह हवा में गोल-गोल घुमाने लगें, तो झोले के अन्दर रखे पेन को तो चक्कर आ ही जायेगा और फिर वो उल्टी में स्याही बोकर ही देगा. इसमें उसकी तो कोई गलती नहीं. अब कोई पेन को झोला में रखे और झोला उठा कर चल दे, झोला घुमा के चल दे, झोला नचा कर चल दे, तो भला पेन की क्या गलती हो सकती है.

स्याही से शर्ट ख़राब होने और स्याही से कॉपी किताब ख़राब होने में बहुत ज्यादा फर्क नहीं होता था. पहली वाली में धुलाई माता जी किया करती थी और दूसरी वाली में धुलाई पिताजी किया करते थे. लेकिन इन सब से पहले तीसरी धुलाई स्कूल में मास्टर जी कर दिया करते थे, उनको लगता था कि होमवर्क किया नहीं है, और जानबुझ कर कॉपी पर स्याही ढरका दिया है. ये ट्राइलॉजी धुलाई का कार्यक्रम 3-2-1 सीक्वेंस में होता था.

निब के पेन से जल्दी-जल्दी लिखना संभव नहीं था. जल्दी-जल्दी में कागज ना फटे और कोंसक्योंसली मास्टर जी का गुस्सा ना फटे इसके लिए आराम आराम से लिखना होता और कोंसक्योंसली हैण्डराइटिंग बहुत अच्छी बनती थी.

अच्छी हैण्डराइटिंग का श्रेय निब वाले पेन को ही जाता है.  









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