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Monday, May 7, 2012

राष्ट्रपति को गैर राजनितिक होना चाहिए

 May 07, 2012     manu shrivastav, rashtrapati ka chunaw, turkash, turkash.blogspot.in     No comments   


मेरा एक मित्र है, जिसने पिछले साल बिहार में लाइब्रेरियन की नौकरी प्राप्त की थी. स्कुल के लाइब्रेरी में किताबें तो थीं नहीं, तो वो खाली क्लास में जाके पढ़ा दिया करता था. कभी हिंदी , कभी संस्कृत, कभी गणित . वैसे उसने भौतिकी से मास्टर डिग्री कर रखी थी. एक शिक्षक जिन्होंने गणित से डिग्री हासिल की थी वो हिंदी पढ़ाते थे. वे कभी कभी इंग्लिश भी पढ़ा दिया करते थे. इसी तरह जो शिक्षक जिस विषय में निपुण थे उसे छोड़ के बाकि के विषय पढ़ाया करते थे.

सवाल ये नहीं है की आपकी पृष्ठभूमि क्या है? सवाल ये है की आपसे किस तरह से, किस तरह का काम लिया जा रहा है . और आप उसे कर पाते हैं की नहीं. उस जरुरत के अनुसार अपने सहज ज्ञान से अपने को अपडेट करते हैं की नहीं.

देश की जनता के पास गैर राजनितिक व्यक्ति के निर्णय पे भरोसा नहीं करने का रास्ता कहाँ बचता है. प्रस्ताव संसद पास करती है. राष्ट्रपति किसी प्रस्ताव को दो बात लौटा बार है. तीसरी बार वो प्रस्ताव स्वतः पास हो जाएगी . इसलिए राष्ट्रपति के राजनितिक पृष्ठभूमि के होने और नहीं होने से जनता को कहाँ फायदा पहुँच रहा है? जनता के हित ke बारे में सोचने ke liye राष्ट्रपति को राजनितिक पृष्ठभूमि का होना ही नहीं चाहिए. राजनितिक पृष्ठभूमि के होने का मतलब है की वो व्यक्ति किसी “खास दल ” के विचारों से सहमत होगा. उसे अन्य दल के द्वारा लाये गए प्रस्ताव पसंद नहीं आयेंगे और वो उसपे अपनी निष्पक्ष राय देने में असमर्थ होगा. अतः राष्ट्रपति को गैर राजनितिक होना चाहिए

भारतीय राष्ट्रपति को जितने सिमित कार्य सिमित हैं उसके लिए उन्हें बहुत ज्यादा राजनितिक ज्ञान की जरुरत नहीं है. स्कुल और कोलेजों के नागरिक शास्त्र में जितना पढाया जाता है, उतना भी काफी है राष्ट्रपति के अधिकार और कर्त्तव्य के बारे में जानने के लिए , बाकि फैसले तो वो अपने सहज ज्ञान से ही लेते हैं .

मैं मानता हूँ की उतनी जानकारी मुझे भी है.

राष्ट्रपति के राजनितिक होने की बात करना, दलों द्वारा नामांकित किये गए अपने उम्मीदवारों के नाम को उचित बताने का बस एक बहाना मात्र हो सकता है.
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