मैं ऐसा कुछ नही कहना चाहती ।। हलाकि मैं खुद एक महिला हूँ और महिला सशक्तिकरण के विरोध में तो बिलकुल नही हूँ पर जब अपने आस पास की कुछ घटनाओ को देखती हूँ तो मन विचलित हो जाता है और यह ख्याल आता है की क्या यही है बस नारीवाद, वीमेन एम्पावरमेंट.. क्या यही वो अधिकार हैं जिन के लिए नारी सदियों से लड़ रही है। क्या पार्टीज में लेट नाईट रुकना, शराब पीना, गाली गलौच करना, कहीं भी अपने पुरुष मित्रों के साथ इंटिमेट होना, बड़ों की इज़्ज़त ना करना, क्या यही सब वो अधिकार हैं जो हमें चाहिए थे समाज से।
जो कानून हमारी सुरक्षा के लिए बनाये गए हैं उनका गलत इस्तेमाल करना, अपने जरा देर के गुस्से और अहंकार को शांत करने के लिए किसी लड़के की ज़िन्दगी बर्बाद करना उस उलटे सीधे आरोप लगाना,
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शादी में तनाव हो तो पति और पति के परिवार के खिलाफ धारा 498ए के तहत शिकायत दर्ज करा दी जाती है और परिवार के खिलाफ फौरन गैर जमानती वारंट जारी हो जाता है, क्या यही सब वो अधिकार हैं जिन के ये महिला सशक्तिकरण और नारीवाद जैसे बड़े बड़े शब्दों का इस्तेमाल होता है।।क्या वाकई आज की महिलाएं सही मायने समझती है महिला सशक्तिकरण के.. खुद को पुरुषों के बराबर मानिए पर उनसे बराबरी करने के लिए ये जरुरी नही की आप उनकी हर अच्छी बुरी आदतों को अपनाये।
जब भी हम किसी पब्लिक ट्रांसपोर्ट में सफ़र करते हैं तो हमेशा लड़कों की तरफ देखा जाता है की वो अपनी सीट किसी बुजुर्ग या जरूरतमंद को दे दें। क्या युवा लड़कियों से ऐसी अपेक्षा नही रखी जा सकती। जब बराबरी का दर्जा मिला है तो क्या हमारा फ़र्ज़ नही की हम भी अपने व्यवहार में बदलाव लाये और जिस बर्ताव और व्यवहार की अपेक्षा हम पुरुषों से रखते हैं उस पर हम खुद भी अमल करें।।
अंत में मैं यही कहूँगी की सभी महिलाएं इन अधिकारों का गलत फायदा नही उठा रहीं है और ना ही महिला सशक्तिकरण गलत है।। मैं भी एक महिला हूँ और जानती हूँ की अब भी कई जगहों पर महिलाओ के साथ उचित व्यवहार नही किया जाता और उन्हें वो अधिकार नही दिए जाते जिन के लिए वो हर तरह से योग्य हैं उन को जरुरत है बदलाव की नयी सोच की पर जो मैंने यहाँ व्यक्त किया है वो कहानी का दूसरा पहलु है। आशा है की मैं अपनी बात सही तरीके से आप तक पहुंचा पायी हूँ।
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Sabhar : AnapSnap.com
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