हम जन्मजात आलसी हैं और
अपने इस आलसपन को फुलफिल करने के लिए ही हमने तरह तरह के आविष्कार भी किये हैं.
आदम ज़माने में पीठ पर लाद
कर सामन ढोने में आलस आने लगा, हमने पहिया खोजा, उसपर लकड़ी का पटरा डाल कर सामन
ढोने लगे. उसमे भी आलस आया तो बैल, घोड़ा, गदहा, भैंसा को जोत दिया की अब तू खिंच
इसे.
गणना करने में आलस आया तो
कैलकुलेटर ले आये, कम्पुटर ले आये, मोबाइल ले आये. बहुत कुछ ले आये.
एक दुसरे से मोहब्बत करना आसान
है, हमें उसमे भी आलस आया, हम नफ़रत करना शुरू किये, चुगली करना शुरू कर दिए.
मिलजुल कर रहना आसान था, हमें
उसमे भी आलस आया हमने मार कुटाई शुरू कर दी.
हम इंसान जन्मजात आलसी हैं.
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