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Thursday, September 27, 2012

भूख

 September 27, 2012     hasya, hindi poem, kavita, manu shrivastav, turkash, turkash.blogspot.in, vyang, कविता, तरकश, मनु श्रीवास्तव, व्यंग, हास्य     2 comments   

शाम हो आई थी,
काम की व्यस्तता से फुरसत पा कर
जब थोडा अव्यस्त हुआ 
तो भूख लग आई.
सोंचा कुछ माँगा लेता हूँ!
क्या मंगाऊं? कितने का मंगाऊं?
सारी जेबें टटोल डाली,
एक चवन्नी भी नहीं मिली,
निराश हो के धम्म से बैठ गया कुर्सी पर
की भूख को बर्दाश्त करना होगा,
ना याद आये भूख की ,
खुद को दुबारा कामो में मशगुल करने लगा.
की अचानक मेरी ख़ुशी का ठिकाना ना रहा
जब मुझे याद आया की 
जो लंच लाया था, 
वो तो अभी टिफिन में ही रखा है,
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Friday, September 14, 2012

एक रियलिस्टिक कविता

 September 14, 2012     hasya, kavita, manu shrivastav, turkash, turkash.blogspot.in     No comments   


सावन की रात में पानी बरसता है, प्रियतम को मिलाने को मन तरसता है,
जोर जोर से बिजली कड़कती है, मेरी बायीं आँख भी फड़कती है,
दूर कहीं कुत्ता भौंकता है - भौंऊ भौं भौं भौं भौंऊ
मोहल्ले वाले घर से निकल के चिल्लाते हैं, 

चोर चोर चोर पकड़ो पकड़ो पकड़ो
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Tuesday, September 11, 2012

अपने बाप का, अपने दादा का, सबका बदला लेगा ठाकरे

 September 11, 2012     hasya, manu shrivastav, thakare, turkash, turkash.blogspot.in, vyang     No comments   


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