शाम हो आई थी,
काम की व्यस्तता से फुरसत पा कर
जब थोडा अव्यस्त हुआ
तो भूख लग आई.
सोंचा कुछ माँगा लेता हूँ!
क्या मंगाऊं? कितने का मंगाऊं?
सारी जेबें टटोल डाली,
एक चवन्नी भी नहीं मिली,
निराश हो के धम्म से बैठ गया कुर्सी पर
की भूख को बर्दाश्त करना होगा,
ना याद आये भूख की ,
खुद को दुबारा कामो में मशगुल करने लगा.
की अचानक मेरी ख़ुशी का ठिकाना ना रहा
जब मुझे याद आया की
जो लंच लाया था,
वो तो अभी टिफिन में ही रखा है,
अच्छी रचना..
ReplyDeleteआखिर घर का खाना ही काम आया :)
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