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Thursday, September 27, 2012

भूख

 September 27, 2012     hasya, hindi poem, kavita, manu shrivastav, turkash, turkash.blogspot.in, vyang, कविता, तरकश, मनु श्रीवास्तव, व्यंग, हास्य     2 comments   

शाम हो आई थी,
काम की व्यस्तता से फुरसत पा कर
जब थोडा अव्यस्त हुआ 
तो भूख लग आई.
सोंचा कुछ माँगा लेता हूँ!
क्या मंगाऊं? कितने का मंगाऊं?
सारी जेबें टटोल डाली,
एक चवन्नी भी नहीं मिली,
निराश हो के धम्म से बैठ गया कुर्सी पर
की भूख को बर्दाश्त करना होगा,
ना याद आये भूख की ,
खुद को दुबारा कामो में मशगुल करने लगा.
की अचानक मेरी ख़ुशी का ठिकाना ना रहा
जब मुझे याद आया की 
जो लंच लाया था, 
वो तो अभी टिफिन में ही रखा है,
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2 comments:

  1. Amrita TanmaySeptember 27, 2012 at 7:33 AM

    अच्छी रचना..

    ReplyDelete
    Replies
      Reply
  2. वाणी गीतSeptember 28, 2012 at 7:45 PM

    आखिर घर का खाना ही काम आया :)

    ReplyDelete
    Replies
      Reply
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