भूख लग गयी हैं
अतंडिया कुलकुला रहीं हैं,
पास वाली चिकन
मोमोज की दुकान
हमको बुला रहीं हैं.
मारा है महंगाई ने,
मारा है महंगाई ने,
जेबों पे ऐसे डाका
हम गरीब तीन शाम से,
हर शाम को,
बिन पिज्जा कर रहे हैं फांका.
चाहिए एक पथ प्रदर्शक
जो खुदा से हमे मिला दे,
देंगे दुआएं, उसे मुफ्त की अपनी,
जो हमे मोमोज खिला दे,
बियर पीले दे
बियर पीले दे
कृपया कविता और लेखनी को ऐसे लिख कर बदनाम ना करे
ReplyDeleteये एक हास्य है, और थोडा सा व्यंग का भी पूट है.
Deleteहास्य और व्यंग भी कविता की एक विधा है.
बाकि, आपके अंतर्मन को इस कविता से ठेस पहुंची हो, तो हम क्षमा प्रार्थी हैं.
मुझे अपनी लेखनी की विधा पर गर्व है.
Deleteकु्छ भी 'साहित्यिक' नहीं है तुम्हारी लेखन शैली में। अरे, साहित्य तो वो होता है, जिसे लिखने वाला कहना क्या चाहता है, यह उस 1200 पन्नों की किताब को 12 बार पढ़ने के बात भी कोई समझ न सके, बिल्कुल माडर्न आर्ट की तरह - इससे कथाकार अच्छा है या बुरा, यह सामान्य पाठकों को समझ न आए - और भाग्वद्गीता और कुरान की तरह, हर वाक्य के हजार मतलब निकाले जा सके - तभी तो हाइस्कूल की परीक्षा में 6 नबर का प्रश्न बनेगा की मनु की कविता 'देंगे दुआएं' की विवेचना करिए। लेखनी की भाषा हमेशा क्लिष्ठ होनी चाहिए, जिसे साधारण पाठक शब्दकोश लेकर पढ़े। इसी तरह से आपकी पुस्तक के प्रकाशक का दुगुना मुनाफ़ा होगा ना भाई? इतनी सी बात आपके समझ में नहीं आई? याद करिए अधिकतर लोग किस समय साहित्य पढ़ना पसंद करते हैं? जी हां, सोने से ठीक पहले। इसलिए आपके साहित्य में वह गहराई होनी चाहिए की 4 -5 पन्नों के भीतर पाठक को वह गहरी नींद आए की मच्छरों के गुंजन से, या बिजली के जाने पर भी, वह नींद न टूटे - इससे आपके पाठक स्वस्थ निरोगी होंगे। अब तुम्हारे लेखन से न तो शब्दकोश बिक रहें हैं, न पाठक स्वस्थ हो रहें हैं, न ही तुम्हारे ऊपर 6 नंबर के प्रश्न बन रहे हैं। आखिर किस बात का गर्व है तुम्हे तुम्हारी लेखनी की विधा पर?
ReplyDelete