ये भी ठीक ही है

  • Home
  • Business
    • Internet
    • Market
    • Stock
  • Parent Category
    • Child Category 1
      • Sub Child Category 1
      • Sub Child Category 2
      • Sub Child Category 3
    • Child Category 2
    • Child Category 3
    • Child Category 4
  • Featured
  • Health
    • Childcare
    • Doctors
  • Home
  • Business
    • Internet
    • Market
    • Stock
  • Downloads
    • Dvd
    • Games
    • Software
      • Office
  • Parent Category
    • Child Category 1
      • Sub Child Category 1
      • Sub Child Category 2
      • Sub Child Category 3
    • Child Category 2
    • Child Category 3
    • Child Category 4
  • Featured
  • Health
    • Childcare
    • Doctors
  • Uncategorized

Saturday, November 10, 2012

देंगे दुआएं, उसे मुफ्त की

 November 10, 2012     manoranjan, manoranjan shriavstav, manu, manu shrivastav, turkash, turkash.blogspot.in, व्यंग, हास्य     4 comments   

भूख लग गयी हैं
अतंडिया कुलकुला रहीं हैं,
पास वाली चिकन 
मोमोज की दुकान 
हमको बुला रहीं हैं.
मारा है महंगाई ने,
जेबों पे ऐसे डाका
हम गरीब तीन शाम से, 
हर शाम को,  
बिन पिज्जा कर रहे हैं फांका.
चाहिए एक पथ प्रदर्शक
जो खुदा से हमे मिला दे,
देंगे दुआएं,  उसे मुफ्त की अपनी,
जो हमे मोमोज खिला दे,
बियर पीले दे 

  • Share This:  
  •  Facebook
  •  Twitter
  •  Google+
  •  Stumble
  •  Digg
Email ThisBlogThis!Share to XShare to Facebook
Newer Post Older Post Home

4 comments:

  1. Anju (Anu) ChaudharyNovember 10, 2012 at 8:12 AM

    कृपया कविता और लेखनी को ऐसे लिख कर बदनाम ना करे

    ReplyDelete
    Replies
    1. Manu ShrivastavNovember 10, 2012 at 9:16 PM

      ये एक हास्य है, और थोडा सा व्यंग का भी पूट है.
      हास्य और व्यंग भी कविता की एक विधा है.
      बाकि, आपके अंतर्मन को इस कविता से ठेस पहुंची हो, तो हम क्षमा प्रार्थी हैं.

      Delete
      Replies
        Reply
    2. Manu ShrivastavNovember 11, 2012 at 9:42 PM

      मुझे अपनी लेखनी की विधा पर गर्व है.

      Delete
      Replies
        Reply
    3. Reply
  2. Rahul Vikram राहुल विक्रमNovember 11, 2012 at 10:38 PM

    कु्छ भी 'साहित्यिक' नहीं है तुम्हारी लेखन शैली में। अरे, साहित्य तो वो होता है, जिसे लिखने वाला कहना क्या चाहता है, यह उस 1200 पन्नों की किताब को 12 बार पढ़ने के बात भी कोई समझ न सके, बिल्कुल माडर्न आर्ट की तरह - इससे कथाकार अच्छा है या बुरा, यह सामान्य पाठकों को समझ न आए - और भाग्वद्गीता और कुरान की तरह, हर वाक्य के हजार मतलब निकाले जा सके - तभी तो हाइस्कूल की परीक्षा में 6 नबर का प्रश्न बनेगा की मनु की कविता 'देंगे दुआएं' की विवेचना करिए। लेखनी की भाषा हमेशा क्लिष्ठ होनी चाहिए, जिसे साधारण पाठक शब्दकोश लेकर पढ़े। इसी तरह से आपकी पुस्तक के प्रकाशक का दुगुना मुनाफ़ा होगा ना भाई? इतनी सी बात आपके समझ में नहीं आई? याद करिए अधिकतर लोग किस समय साहित्य पढ़ना पसंद करते हैं? जी हां, सोने से ठीक पहले। इसलिए आपके साहित्य में वह गहराई होनी चाहिए की 4 -5 पन्नों के भीतर पाठक को वह गहरी नींद आए की मच्छरों के गुंजन से, या बिजली के जाने पर भी, वह नींद न टूटे - इससे आपके पाठक स्वस्थ निरोगी होंगे। अब तुम्हारे लेखन से न तो शब्दकोश बिक रहें हैं, न पाठक स्वस्थ हो रहें हैं, न ही तुम्हारे ऊपर 6 नंबर के प्रश्न बन रहे हैं। आखिर किस बात का गर्व है तुम्हे तुम्हारी लेखनी की विधा पर?

    ReplyDelete
    Replies
      Reply
Add comment
Load more...

Please Be the part of my life...

Blog Archive

  • ►  2021 (1)
    • ►  July (1)
  • ►  2019 (1)
    • ►  March (1)
  • ►  2018 (5)
    • ►  September (1)
    • ►  July (1)
    • ►  June (3)
  • ►  2017 (1)
    • ►  April (1)
  • ►  2016 (7)
    • ►  April (4)
    • ►  January (3)
  • ►  2015 (2)
    • ►  May (2)
  • ►  2014 (10)
    • ►  September (3)
    • ►  August (1)
    • ►  July (2)
    • ►  April (1)
    • ►  February (2)
    • ►  January (1)
  • ►  2013 (12)
    • ►  August (1)
    • ►  July (4)
    • ►  April (4)
    • ►  February (1)
    • ►  January (2)
  • ▼  2012 (57)
    • ►  December (3)
    • ▼  November (4)
      • चंचल बाबा के नुस्खे - आखरी भाग।
      • सन ऑफ़ सरदार.
      • देंगे दुआएं, उसे मुफ्त की
      • जन्म दिवस की बधाई !
    • ►  October (3)
    • ►  September (3)
    • ►  August (7)
    • ►  July (11)
    • ►  June (6)
    • ►  May (8)
    • ►  April (4)
    • ►  March (1)
    • ►  February (6)
    • ►  January (1)
  • ►  2011 (85)
    • ►  December (2)
    • ►  November (9)
    • ►  October (1)
    • ►  September (3)
    • ►  August (6)
    • ►  July (13)
    • ►  June (12)
    • ►  May (16)
    • ►  April (14)
    • ►  March (5)
    • ►  February (1)
    • ►  January (3)
  • ►  2010 (33)
    • ►  December (16)
    • ►  November (3)
    • ►  October (6)
    • ►  September (8)

Popular Posts

  • जय माँ भवानी, थावे वाली
    स्कूल में पढ़ते समय शुक्रवार को ढेड घंटे का लंच टाइम हुआ करता था. हमारे कुछ शिक्षक और कुछ छात्र जुम्मे की नमाज अदा करने जाते थे. मेरा स्कूल ...
  • जहाँ अभी है मंदिर मस्जिद वहाँ बनेगी मधुशाला ||53||
    बजी न मंदिर में घडियाली, चढ़ी न प्रतिमा पर माला, बैठा अपने भवन मुअज्जिन देकर मस्जिद में टला, लूटे खजाने नरपतियों के, गिरीं गढ़ों की दीवारें, ...
  • मम्मी पापा मेरे सबसे अच्छे !!!
    मम्मी  मेरी  बड़ी  है  प्यारी सारी  दुनिया  से  वो  न्यारी . प्यार से कहती मुझे गुडिया रानी, कभी  जो  करती  मैं  शैतानी , मम्मी  कहती  मुझे ...
  • कुत्ते, इंसानों के मोहल्ले में.
    सोसाइटी के सफाई वाले अकसर परेशान रहते हैं. आगे झाड़ू लगा रहे होते हैं. पीछे साफ किये जगह में कुत्ते लोटने लगते हैं. कुत्तों के लोटने से जगह फ...
  • मुन्नी कि बदनामी अभी कम नहीं हुई कि आ गयी शीला कि जवानी !!!
    मुन्नी कि बदनामी अभी कम नहीं हुई कि आ गयी शीला कि जवानी !!! पर, मुन्नी और शीला में कई फर्क हैं. मुन्नी कि गाँव कि गोरी है तो , शीला शहरी छोर...
  • अर्थला – पढ़ना एक व्यसन है (Arthla – Vivek Kumar)
    “पढ़ना एक व्यसन है.” उपरोक्त Quote मैंने इसी किताब से लिया है. अगर आपको पढ़ने का व्यसन है, या सरल भाषा में कहें की पढ़ने का नशा है, तो ये क...
  • अगर भारत में रहना है तो समोसा खाना पड़ेगा
    पिज्जों की बढ़ती माँग के कारण समोसों की माँग में भारी गिरावट देखने को मिली है. जिससे समोसा बेंचने वालों के रोजगार पर भारी असर पड़ा है. समोसों ...
  • मैं पाप बेचती हूँ.
    एक बार घूमते-घूमते कालिदास बाजार गये वहाँ एक महिला बैठी मिली उसके पास एक मटका था और कुछ प्यालियाँ पड़ी थी।  कालिदास जी ने उस महिला से पूछा :...
  • मास्टर जी ! फांसी का फंदा एक बिलान छोटी कर दो

Copyright © ये भी ठीक ही है | Powered by Blogger
Design by Hardeep Asrani | Blogger Theme by NewBloggerThemes.com