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Thursday, July 11, 2013

आईने

 July 11, 2013     aaine, love poem, manu shrivastav, manushrivastav, poem, turkash, turkash.blogspot.in, आईने, कविता     No comments   

क्या जरुरत है तुझको किसी आईने की,
तेरा हुश्न मोहताज है ना किसी की,
संगमरमर की मूरत हो,
बहुत खुबसूरत हो,
तराशी गयी हो,
जो तबियत से फुरसत में,
मानों यकीं मेरा,
तुमसा नहीं कोई,
देखा है तुमको,
तो थम सी गयी है,
ये हवा इन फिजाओं की,
परवाह नहीं हैं उनको,
घुटती हुई सांसों के किसी की,
दीदार तेरा है, रमजान का चाँद,
टकटकी लगाये,
निहारे जा रहे हैं,
तेरा अक्स समाया है,
आँखों में मेरी,
ये आँखे ना कम हैं,
किसी आईने से,
इन्ही आइनों को आजमा के देखो




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