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Friday, June 8, 2018

भारत बंद में हो गयी कुटाई

 June 08, 2018     No comments   

जब भी भारत बंद होता है. एक तरफ जहाँ देश सहम, ठहर सा जाता है तो दूसरी तरफ बंद कराने वाले लोग पुरे देश में उत्पात मचा देते हैं. जन-धन की हानी भी होती है. – काला बिल्ला इन्ही ख्यालों में खोया हुआ था की उसका फ़ोन बज उठा. उसके दोस्त ने फोन किया था की अबे घर में बैठा क्या कर रहा है?
बिल्ला ने कहा, भाई आज तो भारत बंद है. और मैं तब से घर में बैठे बैठे बोर हो गया हूँ. चल कोई मूवी देख आते हैं. बागी 2 लगी है. बहुत मस्त मूवी है. देख कर मज़ा आ जायेगा. एल्फिसटन हॉल में चलेंगे. मेरे घर के बगल में ही तो है. चुपके से हॉल में घुस जायेंगे, किसी को पता भी नहीं चलेगा. और चले आयेंगे.
बिल्ला की बात सुन कर उसका दोस्त राजी हो तो गया, लेकिन जब बिल्ला हॉल के पास पहुंचा देखा की उसका दोस्त वहां खड़ा है और साथ में आठ दस लड़के भी खड़े थे. बिल्ला ने सोंचा लग रहा है की ये सारे लड़के घर में पड़े पड़े बोर हो गये होंगे इसलिए मूवी देखने चले आये होंगे.
लेकिन जब वो उनके पास पहुंचा तो देखा की सभी के हाथो में डंडे हैं, बिल्ला ने अपने दोस्त की तरफ देखा, दोस्त के हाथ में भी डंडा था और ये डंडा बाकी के डंडो से कुछ ज्यादा ही मोटा था.
ऐसा नजारा देख कर काला बिल्ला की जान सुख गयी, होश उड़ गये और दिन में तारे नजर आने लगे.
बिल्ला के आँखों में आँसू आ गये की, उसका दोस्त उसे फिल्म दिखाने के बहाने बुला कर उसकी सुताई करेगा. फिर उसने सोंचा जब ओंखल में सर दे ही दिया है तो मुसल से क्या डरना, या फिर जब सांड को लाल कपडा दिखा ही दिया है तो फिर सांड की मार से क्या डरना. अब जो होगा देखा जाएगा. यह सोंच का उसके आँखों के आंसू उसके आँखों में ही सुख गये.
बिल्ला ने सूखे आंसू वाले आँखों से अपने दोस्त की तरफ देखा, उसने देखा की उसके दोस्त के आँखों में भी आंसू है और उसके चेहरे पर मार-पिटाई के निशान भी है. बिल्ला को समझते देर नहीं लगी की, उसका दोस्त उसी के कहने पर फिल्म देखने आया था, और यहाँ पर पहले से मौजूद लडको ने पहले उसकी जम कर कुटाई की होगी और जब उसने अपने बचाव में कहा होगा की वो मेरे बुलाने पर ही फिल्म देखने आया है तो इन्ही लोगो ने उसके हाथो में मोटा डंडा थमा दिया होगा, ताकि जब मैं यहाँ पहुंचू तो मेरी भी जम कर कुटाई हो सके.
यह सोंच कर बिल्ला और सहम गया, उसका दोस्त उससे भी बड़ा कमीना है. ये बात बिल्ला अच्छी तरह से जानता था. वो अपनी पिटाई का बदला जरुर लेगा.
बिल्ला अभी इन्ही सब ख्यालों में खोया हुआ था की उसके दोस्त ने तड़ाक से उसके पिछवाड़े पर लट्ठ बरसा दी. काला बिल्ला ‘कायं’ से चिल्ला कर अपना पिछवाडा सहलाने लगा. उसने महसूस किया की जहाँ पर लट्ठ से मार पड़ी है, वहां पर काला निशान जरुर पड़ गया होगा. मगर अफ़सोस की बात ये की बिल्ला अपने नजर घुमा कर चेक भी नहीं कर सकता था की निशान काला पड़ा है या नीला पड़ा है. उसने मन ही मन सोंचा, अब ये ऊपर वाले की मर्जी पर है, चाहे काला पड़ा दे- चाहे नीला पड़ा दे.
उसके दोस्त ने पहला डंडा मार कर थोड़े देर के लिए खड़ा हो गया था, अब वो दे दनादन दे दनादन मारे जा रहा था. मानो बिल्ला के दोस्त ने सोंच लिया था, जितनी जोर जोर से वो कुटाया है, उतनी जोर से वो बिल्ले को कुटेगा.
मन भर कूट लेने के बाद बिल्ले का दोस्त सुस्ताने लगा.
मार खा खा कर बिल्ले को भी बागी 2 मूवी के ट्रेलर का एक सिन याद आ गया. जिसमें हीरो, मार खाने के बाद बोलता है – ये जो तेरा टॉर्चर है, वो मेरा वार्म अप है… बिल्ले ने भी अपने दोस्त के आँखों में आँखे डाल कर बोल दिया – ये जो तेरा टॉर्चर है, वो मेरा वार्म अप है..
बस फिर क्या था, वहाँ खड़े बाकी के लड़के भी आ गये और बिल्ले को कूटने लगे. इतनी मार खा कर बिल्ले के होश ठिकाने आ गये और वो वापस अपने घर चला आया..
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संजू बना सिंघम, तो पब्लिक ने मार कर कचूमर निकाल दिया

 June 08, 2018     No comments   

संजू को अजय देवगन की सिंघम बहुत पसंद थी. उसने इस फिल्म को पुरे 34 बार देखा था.
इत्तेफाक से संजू को पुलिस की नौकरी मिल गयी तो उसने सोचा की अब गली के गुंडों की खैर नहीं.
एक दिन वो ड्यूटी पर था तबी उसे वायरलेस पर सुचना मिली की कहीं पर कुछ लोग गुंडा गर्दी कर रहे हैं. उसने अपनी जिप घुमाई और गुंडों के पीछे चल पड़ा.
एक जगह पर उसे कुछ लोग खड़े दिखाई दिए, तो संजू उनलोगों के पास पहुँच कर अपनी पिस्तौल उनपर तान दी. बोला. कोई अपने जगह से नहीं हिलेगा.
भीड़ में से कुछ लोगो ने कुछ बोलना चाह तो संजू ने उन्हें अपने पिस्तौल का डर दिखा कर चुप करा दिया.
तभी कुछ लोग भाग कर वहां से गुजरने वाली एक बस में चढ़ गये और कुछ लोग वहीँ पर रह गये.
जो लोग बस ने नहीं चढ़ पाए, उन्होंने संजू को बहुत मारा और माँ बहन की गाली भी दी की साले भोपड़ी के तेरे कारण हमारी बस छुट गयी.
अब  संजू  को समझ में आई की, वो गुंडों को नहीं बल्कि बस स्टैंड पर खड़े लोगो के ऊपर अपनी पिस्तौल ताने हुआ था.
मगर अब कोई फायदा नहीं था, उसकी कुटाई तो हो चुकी थी
 —————————————–
Originally Inspired by : First Patrol Shift
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अर्थला – पढ़ना एक व्यसन है (Arthla – Vivek Kumar)

 June 08, 2018     No comments   



“पढ़ना एक व्यसन है.”
उपरोक्त Quote मैंने इसी किताब से लिया है. अगर आपको पढ़ने का व्यसन है, या सरल भाषा में कहें की पढ़ने का नशा है, तो ये किताब आपके उस नशे की खुराक को अच्छी तरह से पूरी करती है.
जिस तरह से इस कहानी का ताना बाना बुना गया है, उसमे लगता है की पूरी किताब को एक ही बैठक में पूरी कर दें. मगर ऐसा करना संभव नहीं है. हर थोड़ी देर में आप अपने पढ़ने की प्रक्रिया को रोक कर, पढ़ चुके घटनाओं का मज़ा लेने लगेंगे. पढ़ चुके नशे का आनंद लेने लगेंगे. मैंने इस किताब को सिर्फ चार दिन में पढ़ कर पूरा कर लिया. चार दिन को चार बैठक ही मानना होगा. चार बैठक में ही पूरी किताब को पढ़ डाला, वो भी सोने से पहले. समय होता तो शायद मैं लगातार पढता रहता जब तक की आखरी पृष्ठ तक ना पहुँच जाता है.
घटनाओं का चित्रण इतना सजीव है की घटनाएं आँखों के सामने घटती हुई प्रतीत होती हैं. कभी कभी तो आप उन घटनाओं के साथ अपनी कल्पना भी जोड़ने लगेंगे.
अपनी कहानी में पाठक को भी सम्मिलित कर लेना किसी भी कहानी का सफलतम चरण होता है.
कहानी की भाषा में जो ठहराव है, हिंदी के शब्दों का प्रयोग है, वो अतुलनीय है. लेखक इसके लिए बधाई का पात्र है. किताब के बैक कवर पर लेखक विवेक कुमार की जो तस्वीर है, उस तस्वीर देख कर यकीं नहीं होता की क्या यही वो नौजवान लेखक है जिसकी भाषा शैली इतनी परिपक्व है. मगर प्रत्यक्ष को प्रमाण की जरुरत नहीं होती है और परिपक्वता को उम्र के तराजू में नहीं तौला जा सकता.
किताब में दिए गये नक्से में जम्बू द्वीप के दक्षिण के क्षेत्र का नक्सा, वर्तमान दक्षिण भारत के नक्से जैसे ही लगता है, ६३०० वर्ष पहले की काल खंड में दक्षिण भारत हिस्सा, समुद्र के अन्दर और भी ज्यादा फैला हुआ होगा. चुकी कहानी में उस हिस्से की कोई चर्चा नही की गयी है, इसलिए उस हिस्से पर किसी का ध्यान नहीं गया हो सकता है.
मैं चाहता हूँ कि इस किताब की तुलना चन्द्रकान्ता से करू, चंद्रकांता संतति से करू, अमिश त्रिपाठी जी के लिखे उपन्यासों से करूँ, आचार्य चतुरसेन की किताबों से करू, Game of Thrones से करूँ, मगर मैं करूँगा नहीं, क्योंकि ये किताब अपने आप में एक मिशाल बनने वाली है. मुझे इसके दुसरे अंक का बहुत बेसब्री से इंतजार है…
सामान्यतः ऐसी कहानियाँ पहले इंग्लिश में छपती हैं, बाद में हिंदी में अनुवाद होती हैं. मगर इस बार उल्टा होने वाला है. लगभग साढ़े चार सौ पन्ने की किताब इतने कम मूल्य पर, अपने आप में एक अजूबा है.
अर्थला को best seller की पंक्ति में खड़े होने के लिए विवेक कुमार को अग्रिम बधाई !!
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