ये भी ठीक ही है

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Sunday, October 24, 2010

जय हो बबासीर वाले बाबा कि !!!!

 October 24, 2010     manoranjan shriavstav, manu shrivastav, manu srijan     No comments   

मन्ना भाई एम बी बी एस होके युएस गया,
बबासीर वाले बाबा को बबासीर हुआ.
 
मुन्नी बदनाम होके ऐसे भगी,
बबासीर वाले बाबा को मिर्ची लगी.

कॉम्मन वेल्थ गेम में सबको रेवड़ी बटी ,
बबासीर वाले बाबा कि वैसे  फटी.

यूपी कि सीएम  मायावती हुईं,
बबासीर वाले बाबा करें पुईं पुईं.

कश्मीर में गोली चले ठाएँ ठाएँ
बबासीर वाले बाबा करें काएं काएं.

माओवादी बोम्ब फोड़े भड़ाक भड़ाक,
बबासीर वाले बाबा पादें पडाक पडाक.

चोट लगी बाबा ने आउच किया.
कारण जौहर ने बाबा का कास्टिंग  काउच किया .

जय हो बबासीर वाले  बाबा कि !!!!
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Saturday, October 23, 2010

मुझ गरीब का एक दुश्मन आ गया !

 October 23, 2010     manoranjan shrivastav, manu shrivastav, manu srijan, short story, मुझ गरीब का एक दुश्मन आ गया     No comments   

<a href="http://blogs.raftaar.in/" title="रफ़्तार"><img src="http://www.raftaar.com/blogs/images/raftaar_blog_logo.jpg" border="0" alt="रफ़्तार" title="रफ़्तार"/></a>
                                   


वो अपाहिज था एक पैर से. बैशाखी के सहारे चला करता था. अक्सर हनुमान मंदिर के पास बड़ी ही दयनीय मुद्रा में खड़ा रहा था. मंदिर आने जाने वाले श्रद्धालु  उसे बेचारे को कुछ ना कुछ दे दिया करते थे. यही उसके जीवकोपार्जन का साधन था.

मंदिर में रोज़ आने वाले उसे पहचानने लगे थे, वो भी सभी को पहचानने लगा था. जब कोई उसे कुछ देना भूल जाता वो बड़े अधिकार से लोगो से मांग लिया करता था. लोग उसे ये कहते हुए दे जाते- बाबा , माफ़ करना भूल गया था. ध्यान कही और था.


एक दिन एक भक्त ने उसे शानि मंदिर  कि सीढियों पे उसके अपने चिरपरिचित मुद्रा में खड़े देखा. उन्होंने उससे पूछा -"क्या हुआ बाबा? उधर से इधर कैसे आ गए?"

वो  बोला -"क्या करू? वहाँ  मुझ गरीब का  एक दुश्मन आ गया था, तो इधर आना पड़ा. "
भक्त ने पूछा _"आपका कोण दुश्मन होगा भला?"
वो बोला-"एक अँधा आ गया था, वो जब से मंदिर कि सीढियों पे फूल बेचने लगा था, तब से लोगो ने मुझे देना बंद कर दिया. "

 ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
समर्पित है, उस जुझारू इंसान को , जो आंखे नहीं होने के बाद भी, सिवान और छपरा [बिहार] के बिच के लोकल ट्रेन में मूंगफली बेच के खुद्दारी का जीवनयापन करता है.
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Friday, October 22, 2010

आज बहुत सी लड़कियां जल रही हैं.

 October 22, 2010     aaj bahut se ladkiya jal rahi hain, dahej, hindi poem, manoranjan shrivastav, manu mania, manu shrivastav     No comments   

तुमसे मैं  कुछ कहना चाहता हूँ,
पर डरता हूँ  बताने से,
मैं बहुत कुछ कर सकता हु,
पर डरता हूँ ज़माने से.
                             
                                  क्या पता कही तुम्हारा भाई पहलवान  हो?
                                  पीछे पड़ जाये मेरी जान को ,
                                  वो आके मुझसे कुश्ती लड़ने लगे
                                 और मैं,  पुकारने लगु  भगवान को.

तुम्हारा बाप कुछ नहीं कहता है,
हर वक़्त मुझे घूरता रहता है,
मैं कौन हूँ , क्या करता हूँ?
हर किसी से पूछता रहता है.

                                        तुम्हारी माँ बहुत अच्छी लगती है ,
                                        कुछ नहीं कहती है वो,
                                       काश ! वो तुम्हारी माँ नहीं होती,
                                       और मैं भी उनके उम्र का होता,

शादी तो मैं तुमसे ही करूँगा ,
दहेज़ में कुछ ज्यादा नहीं चाहिए,
टीवी कार  फ्रीज तो सभी  देते हैं,
इसके अलावा २ -४ लाख नगद चाहिए.

                                      कम दहेज़ में मेरी शादी हो गयी
                                      ये बात मुझे खल रही है,
                                       दहेज़ ही वो कारण है जिससे,
                                      आज बहुत सी लड़कियां  जल रही हैं.


करो कुछ ऐसा कि दहेज़ का धंधा बंद हो,
गरीब लडकियों के भी  जीवन में ख़ुशी हो, आनंद  हो.                                
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Thursday, October 21, 2010

तू ही मेरी माशूका

 October 21, 2010     hindi poem, manoranjan, manoranjan shriavstav, manoranjan shrivastav, manu, manu mania, manu shrivastav, manu srijan, तू ही मेरी माशूका     3 comments   

जागती और सोती आँखों का फरक ही मिट जाता है , जब दोनों सूरत में तेरी सूरत दिखाई देती है.
आदि और अंत क्या , जब हर बात तेरे से शुरू होके तेरे पे ही  ख़तम होती है.
क्या चिंता करें जीवन कि दुस्वारियो  कि, मेरा भुत औ भविष्य भी तू है.
भूल गया मैं,  इबादत खुदा कि , याद है, बस, अब तेरी ही इबादत ,

 सांस लेना भूल जाऊ मैं एकबारगी, भूलू कैसे मैं तुझे?
तुझसे ही है मेरी जिंदगी , एक एक पल मैं जीयु तुझे!
हर कदम जो उठती है तेरी ओर , तुझे पाने के लिए, 
तुझे पाना आसन है, बस भागीरथी प्रयाश करना है.
मेरा लक्ष्य.
तू ही मेरी माशूका , तू ही महत्वाकांक्षा ! 
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Tuesday, October 19, 2010

n i kisss you !!

 October 19, 2010     hindi poem, manoranjan shriavstav, manoranjan shrivastav, manu, manu mania, manu shrivastav, manu srijan     No comments   

i come to you,
hug you tightly,
wrap my hand around you ,
a bunch of hair flying on your face,
i remove that from you face,
n i see your sstraberry juicy lips,
n i kisss you tightly
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दहले पे नहला !!

 October 19, 2010     dahale pe nahala, manoranjan, manoranjan shriavstav, manu mania, manu shrivastav, manu srijan, short story, दहले पे नहला     1 comment   

वो उस दिन बहुत जल्दी में था . तेजी से चला जा रहा था. पर देखने वाले उसे देख के समझ रहे थे की वो दौड़ रहा है. पर उसे तो अपने लक्ष्य पर पहुचने का ध्यान था, लोग क्या देख रहे हैं, सोच रहें हैं, इसपे ध्यान देने की जरुरत भी नहीं थी उसे. 

पाँव जितने तेज चल रहे थे, उससे तेज तेज चल रही थी उसकी सोच. 


सोच, सबसे तेज चलती है. पल में चाँद पे , पल में धरती पे फैली चांदनी पे .


सोच रहा था, आज देर न हो जाये ऑफिस पहुचने में. भागा जा रहा था. कल रात ने समय पे सो गया रहता तो आज देर से नींद ना खुलती. और अभी भागना ना पडता.  ऑफिस भी पास नहीं है, मेट्रो ट्रेन के बाद बस भी पकड़ना होगा . भला हो मेट्रो का को इसमें ट्राफिक जाम नहीं होता है.

मेट्रो स्टेशन पहुँच के ही साँस ली हो मानो उसने, एक लम्बी साँस. मेट्रो रेल में चड़ने के बाद ली थी उसने दूसरी साँस. उसने लम्बी साँस ली है ये उसे तब पता लगा जब सामने वाले ने टोका - "भाई ! आराम से साँस ले लो."

सोचा की बोलूं,  "सॉरी". पर बोला नहीं की . कही फिर लम्बी साँस ना छुट जाये.
नियत स्टेशन से बाहर निकल के बस स्टैंड के तरफ भागा.बसें कड़ी थी कतार में . सारे बस वाले चिल्ला ये पहले जाएगी, ये पहले जाएगी.


एक खाली वाले ने उसे टोका  - भाई साब ये बस पहले जाएगी .
उसने खाली बस देख के कहा - नहीं भाई मुझे आज देर से जाना. 
बस वाले ने सुर बदला - अरे ! भाई तो बैठो ना , खाली बस है भर के जाएगी देर तो होगा ही. 
उसने भी नहले पे दहला मारा - नहीं ! भाई मुझे आज जल्दी जाना है देर हो रही है.
उसने हड़बड़ी में गड़बड़ी होने से बचा लिया था. 





 
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