वो अपाहिज था एक पैर से. बैशाखी के सहारे चला करता था. अक्सर हनुमान मंदिर के पास बड़ी ही दयनीय मुद्रा में खड़ा रहा था. मंदिर आने जाने वाले श्रद्धालु उसे बेचारे को कुछ ना कुछ दे दिया करते थे. यही उसके जीवकोपार्जन का साधन था.
मंदिर में रोज़ आने वाले उसे पहचानने लगे थे, वो भी सभी को पहचानने लगा था. जब कोई उसे कुछ देना भूल जाता वो बड़े अधिकार से लोगो से मांग लिया करता था. लोग उसे ये कहते हुए दे जाते- बाबा , माफ़ करना भूल गया था. ध्यान कही और था.
एक दिन एक भक्त ने उसे शानि मंदिर कि सीढियों पे उसके अपने चिरपरिचित मुद्रा में खड़े देखा. उन्होंने उससे पूछा -"क्या हुआ बाबा? उधर से इधर कैसे आ गए?"
वो बोला -"क्या करू? वहाँ मुझ गरीब का एक दुश्मन आ गया था, तो इधर आना पड़ा. "
भक्त ने पूछा _"आपका कोण दुश्मन होगा भला?"
वो बोला-"एक अँधा आ गया था, वो जब से मंदिर कि सीढियों पे फूल बेचने लगा था, तब से लोगो ने मुझे देना बंद कर दिया. "
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समर्पित है, उस जुझारू इंसान को , जो आंखे नहीं होने के बाद भी, सिवान और छपरा [बिहार] के बिच के लोकल ट्रेन में मूंगफली बेच के खुद्दारी का जीवनयापन करता है.
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