ये भी ठीक ही है

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Friday, June 22, 2012

आग में पानी डालें या तेल

 June 22, 2012     mantralay me aag, mumbai, turkash, turkash.blogspot.in     No comments   


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Saturday, June 16, 2012

पताली एलियन का हमला

 June 16, 2012     hasya, laghu katha., manu shrivastav, turkash, turkash.blogspot.in, vyang     1 comment   

राम लाल मोहल्ले में पानी की बहुत किल्लत है. लगभग सारे चापाकल सुख चुके हैं. या यूँ कहें की सारे झारखण्ड का यही हाल है. खबरों की माने तो राजधानी दिल्ली में भी पानी की मारामारी है. खैर दुसरे की फटे में टांग अड़ाने की बजाय रामलाल के मोहल्ले की बात करते हैं. 
पानी के किल्लत से परेशान होके राम लाल जल विभाग गए. वहां किसी ने सलाह दी, 'डीप' बोरिंग करा लो समस्या दूर हो जाएगी.  रामलाल लग गए बोरिंग करने. बिहार में तो बीस फूट पे ही पानी आने लगता है, परन्तु झारखण्ड अस्सी फीट के पहले तो केवल पत्थर ही आते हैं. 
अस्सी फीट पे पानी आया. राम लाल बोले थोडा और डीप करो. 
थोडा और डीप करने पे लौह अयस्क निकलने लगा. 
राम लाल बोले थोडा और डीप करो. फिर कोयला निकला. राम लाल नहीं माने बोले थोडा और डीप करो. 
फिर पाइप से एक कमल का प्रिंट हुआ दुशाला निकला, राम लाल सोंचे पाइप अन्दर हीं अन्दर मुड के कर्णाटक के कोयला खदान तो नहीं पहुँच गयी. 
थोडा और डीप किया गया पाइप को. अब तो उसमे से सों सों कर के हवा निकालने लगी. राम लाल घबडाये ये क्या हुआ.
एक पढ़े लिखे ने समझाया - हवा तो हर जगह मौजूद है, धरती के अन्दर कोई जगह खली होगा, वह हवा मौजूद होगी. 
राम लाल पाइप में मुंह लगा के हल्लो हल्लो बोलने लगे इस उम्मीद में की उधर से कोई "पानी का प्रवक्ता" कोई बयान दे की हां है पानी और डीप करवा लो. 
काफी देर हल्लो हल्लो करने के बाद कोई कोई बोला नहीं अन्दर से तो राम लाल सोंचे की हवा का क्या करना है? पाइप को ऊपर खिचवा लेता हूँ. 
पाइप को वापस खिंचवाया जहाँ से पानी आने लगा वही पाइप सेट करवा दिया.
पानी आ गयी थी, ज़मीं से निकाला हुआ ताज़ा पानी एक ग्लास में ले के गटक गए. लौह अयस्को से मिश्रित पिने के अयोग्य पानी कलेजे को चीरती पेट में पहुंची. पर राम लाल को ख़ुशी थी की पानी की समस्या का समाधान हो गया. 
फुरसत पा के टीवी पर ब्रेकिंग न्यूज देखने बैठे. 
न्यूज आ रहा था. अमेरिका में पताली एलियन का हमला. एक दो फूट चौड़ी पाइप जैसी नली ज़मीं के अन्दर से निकली. उसमे में तरह तरह की आवाजें आ रही थीं. थोड़ी देर के बाद वह वापस ज़मीन के अन्दर वापस चली गयीं. विशेषज्ञों का मानना है की वो निरिक्षण करने आये थे. उनकी योजना शायद धरती पे हमला करने की हो सकती हैं.  
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पापी को सज़ा

 June 16, 2012     manu shrivastav, turkash, turkash.blogspot.in, कहानी, लघु कथा     2 comments   

सावन का महिना था. जोरो की बारिश हो रही थी. बीच बीच में बारिश थोड़े देर के लिए थमती भी थी तो फिर बरसने लगती थी. जोर जोर से बिजली कड़क रही थी. मानो कही पास में ही गिरी हो.
इसी मुसलाधार बारिश में एक बस धीरे धीरे चली आ रही थी. यात्रियों से खचाखच भरी हुई बस आंधी पानी में हिचकोले खाते हुए आगे बढ़ रही थी. कड़कती हुई बिजली कभी बस के दायें तरफ गिरती  थी तो कभी बाएं तरफ.
बस में बैठे हुए पंडित जी बोले - "जरुर इस बस में कोई पापी चढ़ा हुआ है, जिसके कारण बस के आसपास बिजली गिर रही है. अपने साथ साथ वो हमे भी मारेगा."
तभी जोर की बिजली कड़की और ठीक बस के आगे गिरी. उसकी चमक में ड्राइवर को आँखे चुन्धियाँ गयीं. ड्राइवर ने जैसे तैसे बस को सम्हाला नहीं तो सड़क किनारे पेंड से जा टकराती बस. यात्रियों की चीख निकल गयीं. घबडा के सबके मुंह से अलग अलग वक्तव्य निकले. जैसे की ओ तेरी की, हे भगवन, इसकी ..... की , इत्यादी इत्यादी.
पंडी जी खड़े हुए बोले - "हमारे बीच जरुर कोई पापी बैठा है, जिसे प्रकृति दंड देना चाहती है. अब उस पापी के किये का दंड बाकियों को न मिल जाये. इसके लिए सबको बारी बारी से निचे उतरना होगा. जिसे प्रकृति सजा देना चाहती है उसे दे देगी, बाकि लोग बच जायेंगे. "
सबसे पहले ड्राइवर उतरा, शायद उसमे सोंचा हो, मैं ही सबसे बड़ा  पापी हूँ, जाके के पेंड के निचे खड़ा होगा. पर ना बिजली चमकी, ना कड़की और ना ही कहीं गिरी. उसे कुछ हुआ नहीं. वो राजाओं की तरह शान से चलता हुआ अपने सिट पे आ बैठा, बोला - "मैं तो पापी नहीं हूँ."
बारी बारी से सब उतरते गए और वापस आके बस में बैठते गए. किसी को कुछ नहीं हुआ. आखिर में एक बृद्ध बचे, आखिरी सिट पे अपने मैले कुचैले कपडे में सहमे बैठे थे. अब सारे लोगों की नज़ारे उनपे टिकी थी और वे थे की उतरने का नाम ही नहीं ले रहे थे. 
पंडित जी गरजे -" देख क्या रहे हो, इसे उतारो निचे. इसी के कारण हो रहा है ये सब."
कुछ हट्टे कट्टे लोगो ने उसे ज़बरदस्ती निचे उतारना शुरू किया था बिजली का कड़कना शुरू हो गया. उस बृद्ध को बस के दरवाजे बाहर कर के सारे लोग बस में वापस दुबक गए. बृद्ध को भी अपना अंत समय दिखाई देने लगा था.
पर कहते हैं ना की जब तक सांस तब तक आस. बृद्ध पेंड के निचे छिपाने के लिए लपके. 
वो अभी पेंड के निचे पहुंचे भी नहीं थे की जोर की बिजली कड़की और बस पर आ गिरी .


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Friday, June 15, 2012

प्यार का, ना रूप होता है ना रंग होता है. re-post

 June 15, 2012     2 comments   


क्या करोगी जान के मेरे बारे में ऐ जाने जाँ ,
बस जान लो  इतना प्यार का,  ना रूप होता है ना रंग होता है .

क्या करोगी देख के मुझको,  मेरी ऐ जाने जाँ
बस जान लो  इतना प्यार का, ना देह होता है ना आकर होता है.

क्या करोगी सुन के मुझको,  मेरी ऐ जाने जाँ ,
बस जान लो  इतना प्यार का, ना बोली होती है, ना आवाज़ होती है.

कर सको महसूस, तो कर लो, मुझे ऐ जाने जाँ,
बस जान लो  इतना प्यार में, बस ख़ुशी होती , बस दर्द होता है. 
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क्लीन चिट

 June 15, 2012     anna hazare, baba raamdev, clean chit, manu shrivastav, mulayam singh yadav, sharad pawar, turkash, turkash.blogspot.in     1 comment   

बात तब की है जब बिहार में दसवीं, बारहवीं के एक्जाम में कुर्सी बेंच सब पास हो जाया करते थे. माने की जो पढ़ता था वो भी, जो टनडईली करता था वो भी. सं 1995 तक तो सब pass करते थे. achchhe number से. 1996 में कोर्ट के आदेश के बाद कदाचार मुक्त परीक्षा हुई कुछ सालों तक. तब जाकर कुर्सी बेंच को राहत प्राप्त हुई. नहीं तो हर साल कितना कष्टकारी है एक क्लास से दुसरे क्लास में जाना  बिना हाथ pair वाले कुर्सी बेंच के लिए.



खैर, बात कर रहा था की कुर्सी बेंच सब पास कर जाता था. करे भी क्यों नहीं, सभी को 'चिट' करने की खुली छुट  थी .लोग तो यहाँ तक कहते थे की हम तो टेबुल पे चाकू रख के लिखते हैं, मजाल है की कोई रोक ले हमें. इसमें कितनी सत्यता थी, पता नहीं.

शरीफ टाईप  के लोग चिट कर के संतोष कर लेते थे. एक्जाम में लोग "बाहर से भी सपोर्ट" करते थे. कोई खिड़की से फर्रे पास करा रहा होता था तो कोई पत्थर में लपेट के फेंक रहा होता. इसी बहाने क्रिकेट की प्रक्टिस हो जाया करती थी. किसी की थ्रो फेंकने की तो किसी की कैच करने की. 

हम भी पहुंचे  थे देखने की कुर्सी बेंच कैसे पास होता है, आखिर हमारी भी बारी आने वाली थी पास करने की . देखा, एक्जाम रूम की खिड़की पे एक तमतमाया हुआ चेहरा प्रगट हुआ, चिल्लाया- "ये क्या भेजा है, इस चिट में? सादा पन्ना भेज दिया क्या ?"

चिट फेंकने वाला हड बडाया, बडबडाया - " सादा चिट चला गया क्या? लगता है की क्लीन चिट दे दी मैंने!"  
तब पहली बार आवगत हुआ था मैं क्लीन चिट से. फिर तो कई बार या यूँ कहूँ की बार बार सुनाने को मिलाता रहा क्लीन चिट. इसने उसको क्लीन चिट दिया, उनने किसी और को क्लीन चिट दिया. पर मैंने आज तक नहीं सुना की किसी ने किसी से क्लीन चिट लिया.

अब कुछ दिन पहले की बात है. टीम अन्ना चौदह मंत्रियों सहित पी. एम. पे भी आरोप लगा रहे थे की ये सब भ्रष्ट  हैं और हमारे पास इसका सबूत भी है.  वगैरा वगैरा . फिर अन्ना ने खुद पीएम को क्लीन चिट देते हुए कहा - "पी एम इमानदार है, सरकार भ्रष्ट"

सरकार को भ्रष्ट तो बाबा रामदेव भी कहते हैं. उनका मानना है की भ्रष्ट लोगो का कला धन विदेशों में जमा है. वे तो एक निश्चित अमाउंट का उल्लेख करते हुए कहते हैं "इतना" जमा है विदेशी बैंकों में. 

वो कौन है जो बाबा को अंदरूनी खबर  दे जाता है. उस गुप्तचर को तो भारतीय गुप्तचर विभाग में होना चाहिए. ताकि गुप्तचर विभाग अपने माथे से ये कलंक तो हटा सकें की वे हमेशा विफल रहती हैं और कोई सूचना नहीं देती हैं. 

बाबा राम देव, कालेधन की वापसी के लिए सांसदों से मिल के उनका समर्थन प्राप्त करने की कोशिश कर रहे हैं. बाबा सांसदों से मिलते जा रहे हैं और उनको क्लीन चिट देते जा रहे हैं. कुछ लोगो, मुलायम सिंह , शरद पवार , को बाबा की तरफ से क्लीन चिट मिल गई है की "वो भ्रष्ट नहीं हैं."

यानि क्लीन चिट वही दे सकता है जो आरोप लगा रहा हो.

बाबा की लिस्ट में कई सांसदों से मिलाने का प्रोग्राम है और अभी तो उन्होंने क्लीन चिट देना शुरू हीं किया है.  
बाबा, मेरा एक सवाल है आपसे.  आपके प्रोग्राम लिस्ट में कर्णाटक के मंत्रियों और ए. राजा बगैर के नाम हैं क्या ? 
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Sunday, June 3, 2012

आज भारत बंद है

 June 03, 2012     aaj bharat band hai., manu shrivastav, turkash, turkash.blogspot.in     5 comments   

भईया जी सुबह सो कर उठे, बहार का दरवाजा खोला तो पता लगा की आज भारत बंद है. दूध वाले ने दूध नहीं दिया था, सोंचे की खुद चल के ले लूं, पास में ही तो हैं.

खटाल पहुंचे तो दूध वाला बोला - "दूध नहीं है." भईया जी पूछे - क्यों? क्या हुआ? जबाब आया - आज भारत बंद है?

सुन के आश्चर्य हुआ, की केंद्र के पटरी इतना असंतोष की भारत बंद के दौरान भैंसों ने भी दूध देना बंद कर दिया. भईया जी की बात सुन के दूधवाला बोला - अरे नहीं वो सुबह से पानी नहीं आ रहा है. क्या भैंसों को पिलायें, क्या मिलाएं?  बिना खाए पिए भैंसिया अइसन मरने दौड़ी की रामदेव बाबा की राम लीला मैदान वाली घटना याद आ गयी.

पानी नहीं आ रहा है, सुन के भईया जी को बहुत चिंता हुई. अभी तो सो के उठे हैं. अभी कुछ किया धरा भी नहीं और अब वो ज़माना भी नहीं रहा की धो पोंछ के काम चला लें.
इसी चिंतन मनन में लगे थे की रोड से बंद समर्थो का जत्था गुजरा. सामने से एक स्कूटर वाला आ रहा था. भीड़ को देखते ही उसने स्कूटर साइड कर ली. भीड़ को पता लगते ही की स्कूटर वाला काम पे जा रहा है, सबने उसे घेर लिया. निचे उतर के 'निरमा' वाली धुलाई कर दी. मुझे लगा की स्कूटर वाला जोश में आएगा और पुरे भीड़ की धुलाई कर देगा. पर हर कोई 'सिंघम' तो नहीं हो सकता.

एक जोशीला बंद समर्थक चिल्लाया- हम पेट्रोल की बढ़ी कीमतों के विरोध में भारत बंद कर रहे हैं. तुमको देश वासियों की जरा भी परवाह नहीं है. " गुस्से में उसने स्कूटर में आग लगा दी. पेंड़ो को कटते देख के धरती कुछ नहीं बोल पाती. वैसे ही वो अपने स्कूटर ओके धू धू जलते देख के कुछ बोल नहीं पाया.  एक बुजुर्ग जनता, पार्टी में से आगे आये और उसे समझाया - "उदास मत हो बेटा, गाडी का इन्श्योरेंसे तो कराया ही होगा. उसके पैसे से नया गाडी ले लेना."

 तभी सामने से एक समोसे वाला आता दिखाई दिया. भीड़ देखा के तो उसके प्राण सुख गए. वो बाज़ार से भागा भागा आ रहा था. बाज़ार में लोगो ने उसके समोसे गिरा दिए थे. उसने दूर से ही स्कूटर वाले की पिटाई होते देख ली , भीड़ ने उसे घेर लिया, बोले - भूख लग रही है यार, समोसे खिलाओ. समोसे वाला बोला -"वो तो ख़तम हो गयी. लाल चटनी बची है, खा लीजिये. कृपा हो जाएगी". उसके कहते हैं सारी भीढ़ लाइन लगा के लाल चटनी का सेवन करने लगी.

एक कार्यकर्त्ता भईया जी के पास आया और उनको एक पानी का बोतल थमा के बोला - "हई धरो, पानी तो आएगी नहीं आज. बंद में शामिल हो जाओ, तो और भी बोतल मिलेंगे पिने के लिए, सूखे गले से नारा कैसे लगा पाओगे?" भईया जी उससे कुछ कहना चाहते ही थे की कोई चिल्लाया - "भाग भाग ............. भाग " उस बन्दे ने अपना मोबाइल निकाला तो पता लगा की ये तो उसके मोबाइल का रिंग टोन है. पानी वाले भाई फ़ोन पे बतियाते हुए भीड़ में कहीं ग़ुम हो गये.
मोबाइल के रिंग टोन ने भईया जी के लिए प्रेरणा का काम किया. वो धीरे से घर भाग लिए.
बाज़ार बंद था, दुकाने बंद थी, भईया जी ने अपने खिड़की दरवाजा बंद कर लिया. क्योकि आज भारत बंद था. 

 
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