सावन का महिना था. जोरो की बारिश हो रही थी. बीच बीच में बारिश थोड़े देर के लिए थमती भी थी तो फिर बरसने लगती थी. जोर जोर से बिजली कड़क रही थी. मानो कही पास में ही गिरी हो.
इसी मुसलाधार बारिश में एक बस धीरे धीरे चली आ रही थी. यात्रियों से खचाखच भरी हुई बस आंधी पानी में हिचकोले खाते हुए आगे बढ़ रही थी. कड़कती हुई बिजली कभी बस के दायें तरफ गिरती थी तो कभी बाएं तरफ.
बस में बैठे हुए पंडित जी बोले - "जरुर इस बस में कोई पापी चढ़ा हुआ है, जिसके कारण बस के आसपास बिजली गिर रही है. अपने साथ साथ वो हमे भी मारेगा."
तभी जोर की बिजली कड़की और ठीक बस के आगे गिरी. उसकी चमक में ड्राइवर को आँखे चुन्धियाँ गयीं. ड्राइवर ने जैसे तैसे बस को सम्हाला नहीं तो सड़क किनारे पेंड से जा टकराती बस. यात्रियों की चीख निकल गयीं. घबडा के सबके मुंह से अलग अलग वक्तव्य निकले. जैसे की ओ तेरी की, हे भगवन, इसकी ..... की , इत्यादी इत्यादी.
पंडी जी खड़े हुए बोले - "हमारे बीच जरुर कोई पापी बैठा है, जिसे प्रकृति दंड देना चाहती है. अब उस पापी के किये का दंड बाकियों को न मिल जाये. इसके लिए सबको बारी बारी से निचे उतरना होगा. जिसे प्रकृति सजा देना चाहती है उसे दे देगी, बाकि लोग बच जायेंगे. "
सबसे पहले ड्राइवर उतरा, शायद उसमे सोंचा हो, मैं ही सबसे बड़ा पापी हूँ, जाके के पेंड के निचे खड़ा होगा. पर ना बिजली चमकी, ना कड़की और ना ही कहीं गिरी. उसे कुछ हुआ नहीं. वो राजाओं की तरह शान से चलता हुआ अपने सिट पे आ बैठा, बोला - "मैं तो पापी नहीं हूँ."
बारी बारी से सब उतरते गए और वापस आके बस में बैठते गए. किसी को कुछ नहीं हुआ. आखिर में एक बृद्ध बचे, आखिरी सिट पे अपने मैले कुचैले कपडे में सहमे बैठे थे. अब सारे लोगों की नज़ारे उनपे टिकी थी और वे थे की उतरने का नाम ही नहीं ले रहे थे.
पंडित जी गरजे -" देख क्या रहे हो, इसे उतारो निचे. इसी के कारण हो रहा है ये सब."
कुछ हट्टे कट्टे लोगो ने उसे ज़बरदस्ती निचे उतारना शुरू किया था बिजली का कड़कना शुरू हो गया. उस बृद्ध को बस के दरवाजे बाहर कर के सारे लोग बस में वापस दुबक गए. बृद्ध को भी अपना अंत समय दिखाई देने लगा था.
पर कहते हैं ना की जब तक सांस तब तक आस. बृद्ध पेंड के निचे छिपाने के लिए लपके.
वो अभी पेंड के निचे पहुंचे भी नहीं थे की जोर की बिजली कड़की और बस पर आ गिरी .
बहुत खूब
ReplyDeletebehtareen......
ReplyDelete