कुछ उदासी कुछ ख़ुशी कुछ नमी हैं इन आँखों में.....
कहीं खुशबू की लहर तोह कहीं गमी है पटाखों में.......
दीये जलते रहते हैं पास मेरे हर रोज़ हर शाम....
दम ढूँढती रहती हूँ उन चार कंधों में.......
जो मुझे आज़ाद करदें मेरी चिता की राखों में......
पानी में बहकर मुझे भी खुद को धोना है.....
पत्थरों से टकराए बिना मुझे भी पिरोना है....
वोह प्यार वोह मोहब्बत जो मुमकिन न थे....
वोह किसी अपने का साथ पाकर चैन से मुझे सोना है.....
जब उठून तोह सुकून भरी सांस लेकर कह सकूँ....
कि न दुनिया की मार न तानो का तिकोना है....
यहाँ सिर्फ और सिर्फ मिटटी का पुतला ही खिलौना है...
जहाँ हर छत क नीचे प्यार का बिछौना है...
और नफरत का वास नहीं सिर्फ नफरत का गौना है....
बस प्यार के ही फूल लगें पेड़ों की दालों में....
अब उन्ही फूलों को एक प्यार की माला में पिरोना है...
और इसी माला क साथ मुझे बिदा होना है....
बस ख़ुशी ही ख़ुशी हो इन आँखों में....
बस खुशबु की लहर और दिवाली हो पटाखों में....
सिर्फ वोही चार काँधे चाहियें....
जो आज़ाद करदें मुझे मेरी चिता की राखों में....
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