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Monday, April 29, 2013

सोंच रहा हूँ मैं !

 April 29, 2013     hindi kavita., hindi poem, manu shrivastav, turkash, turkash.blogspot.in, सोंच रहा हूँ मैं     No comments   


पूछ रहा था वो,
क्या लिखूं आज,
सोंच रहा हूँ मैं,
तू हीं,
कुछ बता,
बोर हो चूका हूँ,
प्यार मोह्हबत की
बातें लिखा कर,
सोंच रहा हूँ,
कुछ नया लिखू,
कह दिया मैंने,
लिखना है तो,
भूख और हवस
पर लिख.
मना कर दिया उसने,
कहा - कभी तो डिसेंट रहा कर,
अब,
सोंच रहा हूँ मैं,
डिसेंट कैसे रहा जाता है?
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Thursday, April 18, 2013

सिगरेट का धुआँ

 April 18, 2013     hasya, hindi kavita., hindi poem, kavita, manu, manu shrivastav, manushrivastav, turkash, turkash.blogspot.in, vyang, व्यंग्य, सिगरेट का धुआँ, हास्य     No comments   

सिगरेट ली,
ओठों से लगाई,
माचिस ली,
फ़र्रररर से जलाई,
कश खिंचा,
और टशन में धुंआ छोडा,
बेचैन रूह को,
राहत आई।
उंगली में सिग्गी फंसा के,
आसपास जायजा लेना शुरू किया .
सामने पौधों की दुकान से,
दो कन्यायें मुझे ताड़ रहीं थीं.
तीनों की नज़र टकराई,
तीनो झेंप गये.  
मैंने एक और कश ली और,
नज़र थोडा और घुमाया,
अगले हि पल मैंने सिगरेट फेंका,
उसको जूतों से मसला।
थोड़ी देर पहले जो धुआँ,
सिगरेट से उड़ रहा था,
अब वही मेरे चेहरे से उड़ रहा था. 
चचा को अभी हीं इधर आना था। 
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Tuesday, April 16, 2013

वो

 April 16, 2013     hindi kavita., kavita, manu, manu shrivastav, manushrivastav, turkash, turkash.blogspot.in     No comments   


वो,
ठुनकते हैं,
मचलते हैं,
जिद करते हैं,
लड़ते हैं, 
मुस्कुराते हैं,
फिर खिलखिलाते हैं,
नादान हैं,
बच्चे हैं,
सिख जायेंगे,
दुनियादारी क्या है?
इसका कोई,
गुरुकुल नहीं, 
इसका कोई,
आचार्य नहीं,
ये कोई,
हौवा नहीं,
अकल बढती है,
समझ बढती है,
फिर आ जाता है,
सलीका,
हर चीज़ का। 
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Sunday, April 14, 2013

एज युजुवल विद्वान !!

 April 14, 2013     hasya, manu, manu shrivastav, manushrivastav, short story, story, turkash, turkash.blogspot.in, vyang     5 comments   

एक किवदंती है. 
एक पंडित जी थे, बहुत विद्वान थे. एज युजुवल. 
उनकी शादी हो गयी , ससुराल वालो ने अपनी लड़की की बड़ाई में बोल दिया था की लड़की पढ़ी लिखी है. ये सुन कर पंडित जी बौखला गये थे. अब वो अपनी पत्नी के हर काम में गलती निकालते. 
पत्नी ने दाल रोटी बनायी , पंडित जी भड़क गये - चावल क्यों नहीं बनाया?
पत्नी ने चावल बनाया, पंडित जी भड़क आज  दही चुरा खाना था. 
पत्नी ने दही चुरा परोसा पंडित जी भड़क गये , आज तो दाल रोटी बनानी चाहिए .
सोने का वक़्त होता, पत्नी ने पलंग पर बिछावन करी, पंडित जी भड़क ग्ये. मुझे चारपाई पर सोना है. चारपाई पर बिछावन लगा पंडित जी को चटाई पर सोना था. चटाई पर बिछावन लगा तो , आँगन में सोना था, आँगन में बिछावन लगा तो उनको पलंग पर सोना था. मतलब रोग कमी निकाल कर पंडिताइन की पिटाई हो जाती थी .
एक रात पंडिताइन ने पंडित जी को खाने में दही चुरा दिया. पंडित ने कहा उन्हें तो दाल रोटी खानी है. पंडिताइन बोली, वो भी बना के रखा है. अभी लाती हूँ . पंडित जी बोले - नहीं रहने दे, मुझे चावल दाल खानी है। पंडिताइन बोली - वो भी बना के रखी है, अभी लाती हॊ। अब पंडित जी को कुछ बहाना नहीं मिल सका आज तो चुप चाप खाना खाना पड़ा उनको . 
खाना खा के सोने की बारी आयी .
सोने केलिए पलंग पर बिछावन लगा था. पंडित बोले मैं तो चटाई पर सोऊंगा , पत्नी बोली - वो भी लगा हुआ है, आप वहां भी सो सकते है। पंडित बोले नहीं मैं आंगन में सोउंगा . पंडिताइन बोली - आँगन में भी बिछावन लगा दिया है. आप वहां भी सो सकते हैं। 
पंडित बोले मैं तो छत पर सोऊंगा, बहुत गर्मी है. पंडिताइन बोली - वह भी बिछावन लगा है. 
दोनों पति पत्नी छत पर सोने गये .
गर्मी का मौसम था। आसमान पूरी तरह से साफ़ था. आसमान में आकाशगंगा निकली हुई थी। पंडित जी ने पूछा - वो क्या है?
पंडिताइन बोली - वो आकाश गंगा है. रात में भगवन अपने रथ पर सवार होकर, इसी रस्ते से गुजरते हैं। 
यह सुनते हि पंडित जी उठे और पंडिताइन की पिटाई प्रारंभ कर दी . इस रास्ते से गुजरने वाला रथ मेरे ऊपर गिर गया तो , मैं तो मर हीं जाऊँगा। तू मुझे जान से मारना चाहती है, तभी मेरे सोने के लिए यहाँ पर बिछावन लगाया.
उस दिन भी पंडिताइन की पिटाई होने से नहीं बच सकी। पंडित जी ने नुस्क निकाल हीं लिया था.
आखिर वो 
एक पंडित जी थे, बहुत विद्वान थे. एज युजुवल. 
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