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Thursday, April 18, 2013

सिगरेट का धुआँ

 April 18, 2013     hasya, hindi kavita., hindi poem, kavita, manu, manu shrivastav, manushrivastav, turkash, turkash.blogspot.in, vyang, व्यंग्य, सिगरेट का धुआँ, हास्य     No comments   

सिगरेट ली,
ओठों से लगाई,
माचिस ली,
फ़र्रररर से जलाई,
कश खिंचा,
और टशन में धुंआ छोडा,
बेचैन रूह को,
राहत आई।
उंगली में सिग्गी फंसा के,
आसपास जायजा लेना शुरू किया .
सामने पौधों की दुकान से,
दो कन्यायें मुझे ताड़ रहीं थीं.
तीनों की नज़र टकराई,
तीनो झेंप गये.  
मैंने एक और कश ली और,
नज़र थोडा और घुमाया,
अगले हि पल मैंने सिगरेट फेंका,
उसको जूतों से मसला।
थोड़ी देर पहले जो धुआँ,
सिगरेट से उड़ रहा था,
अब वही मेरे चेहरे से उड़ रहा था. 
चचा को अभी हीं इधर आना था। 
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