ये भी ठीक ही है

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Sunday, July 25, 2021

निब का पेन

 July 25, 2021     No comments   

निब का पेन, जो दवात पूजा के दिन खरीद कर नया मिलता था, और टारगेट रहता है था की पुरे साल इसी से लिखाई-पढाई होगी. मगर मजाल है कि वो एक महीने से ज्यादा चल सके.

पहले हफ्ते तो ठीक ठाक चलता था निब का पेन, लेकिन हफ्ता आते-आते उसमें खराबी आने लगती थी. खराबी आने के कई कारण हुआ करते थे. जैसे कि क्लास में रार-तकरार हुई तो पेन का ढक्कन खोला और घोंप दिया निब. या फिर बेंच पर हैण्डराइटिंग की प्रैक्टिस, या फिर एटसेट्रा-एटसेट्रा कारण से.

निब का पेन ख़राब होने पर स्याही बोकरने लगता था और तब स्याही को बोकरने से रोकने के लिए किसी ने बताया था कि पेन में ग्रीस लगाओ, या यूनिवर्सल तरीका है. लेकिन ये टोटका भी काम ना आता था. ग्रीस की कालिख पोतने के बाद भी स्याही की ताकत को दबाना आसान नहीं होता था, स्याही बाहर आ ही जाती थी.

स्याही बोकरने के बाद जब पेन का पेट खाली हो जाता तो उसे भर कर दांतों से टाइट करने के चक्कर में ओठ ब्लू और स्वाद कड़वा हो जाता था. गनीमत ये होती थी कि ज्यादातर नीले रंग की स्याही का इस्तेमाल होता था, पिंक या पर्पल नहीं. वरना हमारे लिप्स, सनी लियॉन वाली पिंक लिप्स या ऐश्वर्या राय वाली पर्पल लिप्स, के लिए इन्सपिरेशन का काम करते.  

बोकरती हुई स्याही वाला निब का पेन बहुत ही समाजवादी होता था. शर्ट की जेब में रखो या पेंट की जेब में, दोनों जगह एक समान ही स्याही बोकरता था और एक समान ही दाग पड़ा करते थे. और उस समय 'दाग अच्छे हैं' का जमाना नहीं था. दाग पढ़ने पर अच्छी तरह से धुलाई होती थी- शर्ट की भी, पेंट की भी और हमारी भी. और कभी गलती से पेन को किताब वाले झोला में रख लिया, जो की पुराने पैंट को रियुज करने के उद्देश्य से सिलाई कर के बनाया गया होता था, तो निब वाले पेन महोदय ऐसी उल्टी करते थे कि कॉपी-किताब सभी स्याहीमय हो जाया करती थी और फिर पता करना कि मैथ की कॉपी कौन सी है और हिंदी की कॉपी कौन सी है टॉमक्रूस के मिशन इम्पॉसिबल हो जाया करती.

घर से निकल कर स्कूल पहुँचने के बीच में, झोला को घुमा घुमा के पीठ पर लाद लिया, तो कभी उसे घुमा के सर पर रख लिया या फिर थौर के हथौड़े की तरह हवा में गोल-गोल घुमाने लगें, तो झोले के अन्दर रखे पेन को तो चक्कर आ ही जायेगा और फिर वो उल्टी में स्याही बोकर ही देगा. इसमें उसकी तो कोई गलती नहीं. अब कोई पेन को झोला में रखे और झोला उठा कर चल दे, झोला घुमा के चल दे, झोला नचा कर चल दे, तो भला पेन की क्या गलती हो सकती है.

स्याही से शर्ट ख़राब होने और स्याही से कॉपी किताब ख़राब होने में बहुत ज्यादा फर्क नहीं होता था. पहली वाली में धुलाई माता जी किया करती थी और दूसरी वाली में धुलाई पिताजी किया करते थे. लेकिन इन सब से पहले तीसरी धुलाई स्कूल में मास्टर जी कर दिया करते थे, उनको लगता था कि होमवर्क किया नहीं है, और जानबुझ कर कॉपी पर स्याही ढरका दिया है. ये ट्राइलॉजी धुलाई का कार्यक्रम 3-2-1 सीक्वेंस में होता था.

निब के पेन से जल्दी-जल्दी लिखना संभव नहीं था. जल्दी-जल्दी में कागज ना फटे और कोंसक्योंसली मास्टर जी का गुस्सा ना फटे इसके लिए आराम आराम से लिखना होता और कोंसक्योंसली हैण्डराइटिंग बहुत अच्छी बनती थी.

अच्छी हैण्डराइटिंग का श्रेय निब वाले पेन को ही जाता है.  









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Friday, March 1, 2019

कर्मचारी ने माँगा घुस, घुस देने वाला 1000 रुपये का पुराना नोट देता हुआ पकड़ा गया.

 March 01, 2019     No comments   

Image result for bribe

एक सरकारी कार्यालय में 
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Friday, September 14, 2018

 September 14, 2018     No comments   

काफी इन्तेजार के बाद काला बिल्ला एक बार फिर आप सबके सामने उपस्थित है..
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Tuesday, July 31, 2018

गब्बू की चिंता

 July 31, 2018     No comments   

गब्बू बहुत ही चिंतित मुद्रा में बैठा अपने हाथों में लिए दोनों तस्वीरों को देख रहा था. दोनों तस्वीरें उसी की थी. एक पिछले साल की थी और दूसरी मुश्किल से सात आठ दिन पहले की होगी.
गब्बू अपने पापा के पास जाकर बोला “पापा! आपने इस बार जो जूता ख़रीदा है वो पहले वाले से बहुत छोटा है.”
“लेकिन मैंने तो तुम्हारा जूता छः महीने पहले ख़रीदा था और तुम अब ये बात बता रहे हो?” उसके पापा ने पूछा.
“हाँ! पापा. क्योकिं फोटो मैंने अभी देखा तो अंतर भी अभी समझ में आया” गब्बू ने जबाब दिया.
पापा ने आश्चर्य से बोले “जरा मुझे भी दिखाओ क्या अंतर है?”
गब्बू दोनों तस्वीरें अपने पापा को दिखाने लगा.
“ये देखिये पुरानी तस्वीर, पिछले साल जब आपने मुझे जुते से मारा था, उसका निशान कितना बड़ा आया है फोटो ने और पिछले हफ्ते जो आपने मारा है, उसका निशान कितना छोटा आया है.”
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Friday, June 8, 2018

भारत बंद में हो गयी कुटाई

 June 08, 2018     No comments   

जब भी भारत बंद होता है. एक तरफ जहाँ देश सहम, ठहर सा जाता है तो दूसरी तरफ बंद कराने वाले लोग पुरे देश में उत्पात मचा देते हैं. जन-धन की हानी भी होती है. – काला बिल्ला इन्ही ख्यालों में खोया हुआ था की उसका फ़ोन बज उठा. उसके दोस्त ने फोन किया था की अबे घर में बैठा क्या कर रहा है?
बिल्ला ने कहा, भाई आज तो भारत बंद है. और मैं तब से घर में बैठे बैठे बोर हो गया हूँ. चल कोई मूवी देख आते हैं. बागी 2 लगी है. बहुत मस्त मूवी है. देख कर मज़ा आ जायेगा. एल्फिसटन हॉल में चलेंगे. मेरे घर के बगल में ही तो है. चुपके से हॉल में घुस जायेंगे, किसी को पता भी नहीं चलेगा. और चले आयेंगे.
बिल्ला की बात सुन कर उसका दोस्त राजी हो तो गया, लेकिन जब बिल्ला हॉल के पास पहुंचा देखा की उसका दोस्त वहां खड़ा है और साथ में आठ दस लड़के भी खड़े थे. बिल्ला ने सोंचा लग रहा है की ये सारे लड़के घर में पड़े पड़े बोर हो गये होंगे इसलिए मूवी देखने चले आये होंगे.
लेकिन जब वो उनके पास पहुंचा तो देखा की सभी के हाथो में डंडे हैं, बिल्ला ने अपने दोस्त की तरफ देखा, दोस्त के हाथ में भी डंडा था और ये डंडा बाकी के डंडो से कुछ ज्यादा ही मोटा था.
ऐसा नजारा देख कर काला बिल्ला की जान सुख गयी, होश उड़ गये और दिन में तारे नजर आने लगे.
बिल्ला के आँखों में आँसू आ गये की, उसका दोस्त उसे फिल्म दिखाने के बहाने बुला कर उसकी सुताई करेगा. फिर उसने सोंचा जब ओंखल में सर दे ही दिया है तो मुसल से क्या डरना, या फिर जब सांड को लाल कपडा दिखा ही दिया है तो फिर सांड की मार से क्या डरना. अब जो होगा देखा जाएगा. यह सोंच का उसके आँखों के आंसू उसके आँखों में ही सुख गये.
बिल्ला ने सूखे आंसू वाले आँखों से अपने दोस्त की तरफ देखा, उसने देखा की उसके दोस्त के आँखों में भी आंसू है और उसके चेहरे पर मार-पिटाई के निशान भी है. बिल्ला को समझते देर नहीं लगी की, उसका दोस्त उसी के कहने पर फिल्म देखने आया था, और यहाँ पर पहले से मौजूद लडको ने पहले उसकी जम कर कुटाई की होगी और जब उसने अपने बचाव में कहा होगा की वो मेरे बुलाने पर ही फिल्म देखने आया है तो इन्ही लोगो ने उसके हाथो में मोटा डंडा थमा दिया होगा, ताकि जब मैं यहाँ पहुंचू तो मेरी भी जम कर कुटाई हो सके.
यह सोंच कर बिल्ला और सहम गया, उसका दोस्त उससे भी बड़ा कमीना है. ये बात बिल्ला अच्छी तरह से जानता था. वो अपनी पिटाई का बदला जरुर लेगा.
बिल्ला अभी इन्ही सब ख्यालों में खोया हुआ था की उसके दोस्त ने तड़ाक से उसके पिछवाड़े पर लट्ठ बरसा दी. काला बिल्ला ‘कायं’ से चिल्ला कर अपना पिछवाडा सहलाने लगा. उसने महसूस किया की जहाँ पर लट्ठ से मार पड़ी है, वहां पर काला निशान जरुर पड़ गया होगा. मगर अफ़सोस की बात ये की बिल्ला अपने नजर घुमा कर चेक भी नहीं कर सकता था की निशान काला पड़ा है या नीला पड़ा है. उसने मन ही मन सोंचा, अब ये ऊपर वाले की मर्जी पर है, चाहे काला पड़ा दे- चाहे नीला पड़ा दे.
उसके दोस्त ने पहला डंडा मार कर थोड़े देर के लिए खड़ा हो गया था, अब वो दे दनादन दे दनादन मारे जा रहा था. मानो बिल्ला के दोस्त ने सोंच लिया था, जितनी जोर जोर से वो कुटाया है, उतनी जोर से वो बिल्ले को कुटेगा.
मन भर कूट लेने के बाद बिल्ले का दोस्त सुस्ताने लगा.
मार खा खा कर बिल्ले को भी बागी 2 मूवी के ट्रेलर का एक सिन याद आ गया. जिसमें हीरो, मार खाने के बाद बोलता है – ये जो तेरा टॉर्चर है, वो मेरा वार्म अप है… बिल्ले ने भी अपने दोस्त के आँखों में आँखे डाल कर बोल दिया – ये जो तेरा टॉर्चर है, वो मेरा वार्म अप है..
बस फिर क्या था, वहाँ खड़े बाकी के लड़के भी आ गये और बिल्ले को कूटने लगे. इतनी मार खा कर बिल्ले के होश ठिकाने आ गये और वो वापस अपने घर चला आया..
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संजू बना सिंघम, तो पब्लिक ने मार कर कचूमर निकाल दिया

 June 08, 2018     No comments   

संजू को अजय देवगन की सिंघम बहुत पसंद थी. उसने इस फिल्म को पुरे 34 बार देखा था.
इत्तेफाक से संजू को पुलिस की नौकरी मिल गयी तो उसने सोचा की अब गली के गुंडों की खैर नहीं.
एक दिन वो ड्यूटी पर था तबी उसे वायरलेस पर सुचना मिली की कहीं पर कुछ लोग गुंडा गर्दी कर रहे हैं. उसने अपनी जिप घुमाई और गुंडों के पीछे चल पड़ा.
एक जगह पर उसे कुछ लोग खड़े दिखाई दिए, तो संजू उनलोगों के पास पहुँच कर अपनी पिस्तौल उनपर तान दी. बोला. कोई अपने जगह से नहीं हिलेगा.
भीड़ में से कुछ लोगो ने कुछ बोलना चाह तो संजू ने उन्हें अपने पिस्तौल का डर दिखा कर चुप करा दिया.
तभी कुछ लोग भाग कर वहां से गुजरने वाली एक बस में चढ़ गये और कुछ लोग वहीँ पर रह गये.
जो लोग बस ने नहीं चढ़ पाए, उन्होंने संजू को बहुत मारा और माँ बहन की गाली भी दी की साले भोपड़ी के तेरे कारण हमारी बस छुट गयी.
अब  संजू  को समझ में आई की, वो गुंडों को नहीं बल्कि बस स्टैंड पर खड़े लोगो के ऊपर अपनी पिस्तौल ताने हुआ था.
मगर अब कोई फायदा नहीं था, उसकी कुटाई तो हो चुकी थी
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Originally Inspired by : First Patrol Shift
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अर्थला – पढ़ना एक व्यसन है (Arthla – Vivek Kumar)

 June 08, 2018     No comments   



“पढ़ना एक व्यसन है.”
उपरोक्त Quote मैंने इसी किताब से लिया है. अगर आपको पढ़ने का व्यसन है, या सरल भाषा में कहें की पढ़ने का नशा है, तो ये किताब आपके उस नशे की खुराक को अच्छी तरह से पूरी करती है.
जिस तरह से इस कहानी का ताना बाना बुना गया है, उसमे लगता है की पूरी किताब को एक ही बैठक में पूरी कर दें. मगर ऐसा करना संभव नहीं है. हर थोड़ी देर में आप अपने पढ़ने की प्रक्रिया को रोक कर, पढ़ चुके घटनाओं का मज़ा लेने लगेंगे. पढ़ चुके नशे का आनंद लेने लगेंगे. मैंने इस किताब को सिर्फ चार दिन में पढ़ कर पूरा कर लिया. चार दिन को चार बैठक ही मानना होगा. चार बैठक में ही पूरी किताब को पढ़ डाला, वो भी सोने से पहले. समय होता तो शायद मैं लगातार पढता रहता जब तक की आखरी पृष्ठ तक ना पहुँच जाता है.
घटनाओं का चित्रण इतना सजीव है की घटनाएं आँखों के सामने घटती हुई प्रतीत होती हैं. कभी कभी तो आप उन घटनाओं के साथ अपनी कल्पना भी जोड़ने लगेंगे.
अपनी कहानी में पाठक को भी सम्मिलित कर लेना किसी भी कहानी का सफलतम चरण होता है.
कहानी की भाषा में जो ठहराव है, हिंदी के शब्दों का प्रयोग है, वो अतुलनीय है. लेखक इसके लिए बधाई का पात्र है. किताब के बैक कवर पर लेखक विवेक कुमार की जो तस्वीर है, उस तस्वीर देख कर यकीं नहीं होता की क्या यही वो नौजवान लेखक है जिसकी भाषा शैली इतनी परिपक्व है. मगर प्रत्यक्ष को प्रमाण की जरुरत नहीं होती है और परिपक्वता को उम्र के तराजू में नहीं तौला जा सकता.
किताब में दिए गये नक्से में जम्बू द्वीप के दक्षिण के क्षेत्र का नक्सा, वर्तमान दक्षिण भारत के नक्से जैसे ही लगता है, ६३०० वर्ष पहले की काल खंड में दक्षिण भारत हिस्सा, समुद्र के अन्दर और भी ज्यादा फैला हुआ होगा. चुकी कहानी में उस हिस्से की कोई चर्चा नही की गयी है, इसलिए उस हिस्से पर किसी का ध्यान नहीं गया हो सकता है.
मैं चाहता हूँ कि इस किताब की तुलना चन्द्रकान्ता से करू, चंद्रकांता संतति से करू, अमिश त्रिपाठी जी के लिखे उपन्यासों से करूँ, आचार्य चतुरसेन की किताबों से करू, Game of Thrones से करूँ, मगर मैं करूँगा नहीं, क्योंकि ये किताब अपने आप में एक मिशाल बनने वाली है. मुझे इसके दुसरे अंक का बहुत बेसब्री से इंतजार है…
सामान्यतः ऐसी कहानियाँ पहले इंग्लिश में छपती हैं, बाद में हिंदी में अनुवाद होती हैं. मगर इस बार उल्टा होने वाला है. लगभग साढ़े चार सौ पन्ने की किताब इतने कम मूल्य पर, अपने आप में एक अजूबा है.
अर्थला को best seller की पंक्ति में खड़े होने के लिए विवेक कुमार को अग्रिम बधाई !!
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Sunday, April 30, 2017

हम इंसान जन्मजात आलसी हैं.

 April 30, 2017     No comments   

हम जन्मजात आलसी हैं और अपने इस आलसपन को फुलफिल करने के लिए ही हमने तरह तरह के आविष्कार भी किये हैं.
आदम ज़माने में पीठ पर लाद कर सामन ढोने में आलस आने लगा, हमने पहिया खोजा, उसपर लकड़ी का पटरा डाल कर सामन ढोने लगे. उसमे भी आलस आया तो बैल, घोड़ा, गदहा, भैंसा को जोत दिया की अब तू खिंच इसे.
गणना करने में आलस आया तो कैलकुलेटर ले आये, कम्पुटर ले आये, मोबाइल ले आये. बहुत कुछ ले आये.
एक दुसरे से मोहब्बत करना आसान है, हमें उसमे भी आलस आया, हम नफ़रत करना शुरू किये, चुगली करना शुरू कर दिए.  
मिलजुल कर रहना आसान था, हमें उसमे भी आलस आया हमने मार कुटाई शुरू कर दी.
हम इंसान जन्मजात आलसी हैं.

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Sunday, April 17, 2016

अगर भारत में रहना है तो समोसा खाना पड़ेगा

 April 17, 2016     No comments   


samosachutneyपिज्जों की बढ़ती माँग के कारण समोसों की माँग में भारी गिरावट देखने को मिली है. जिससे समोसा बेंचने वालों के रोजगार पर भारी असर पड़ा है. समोसों के खरीददार नहीं होने की वजह से कई लोगो ने अपना दुकान-दऊरी बंद करने का फैसला लिया. समोसों की दुकान बंद होने के कारण कई पुलिस वाले भी सदमे में हैं. 

उपरोक्त बात सुन कर कई लोग हैरान हो सकते हैं मगर सड़क किनारे समोसों का ठेला कई पुलिस वालों के उपरी आमदनी कई गंगोत्रियों में एक है, जब जब गंगोत्री सूखने लगे तो चिंता होनी स्वाभाविक है. भले हि असली गंगोत्री, जिससे गंगा निकलती है के सूखने से या गंगा के प्रवाह के कम पड़ने से उनको फरक नहीं पड़ता हो, मगर मगर समोसा के ठेला से होने वाली आमदनी की गंगोत्री सूखने पर रात की नींद और दिन की ड्यूटी पर की नींद दोनों गायब हो चुकी थी.
उधर समोसा महासंघ के उपाध्यक्ष ने कहा है समोसा एक घरेलु उद्योग है, और ये स्टैंड अप इंडिया को भी समर्थन करता है. क्योकिं समोसा बनाने वाले से लेकर बेचने वाले से लेकर खाने वाले तक सब खड़े खड़े होता है. इस लिए हम समोसों के ठेला को बंद नहीं होने देंगे. और इसके लिए हम आन्दोलन करेंगे.
समोसा उद्योग को अगर किसी से खतरा है तो वो है पिज्जा. लोग पिज्जा खाने को स्टेटस सिंबल समझने लगे हैं. मगर पिज्जा खा खा कर मोटे होते जा रहे हैं. मगर समोसा खाकर किसी को मोटे होते देखा है किसी ने? पिज्जा विदेशी चीज है, भले हि उसका उत्पादन देश में होता है तो क्या हुआ? भले हि उसमे प्रयोग होने वाले प्याज, मिर्च, नमक, घी, डालडा, मैदा देश में पैदा होता है तो क्या हुआ, मगर पिज्जा है तो विदेशी चीज.
हम पिज्जा के विरोध में रैली निकालेंगे और सड़क जाम करेंगे.  हम पिज्जा का पुतला दहन भी करेंगे. भारत में विदेशियों की कोई जरुरत नहीं है. जिसे पिज्जा खाना है वो भारत छोड़ कर चला जाए, जिसे भारत में रहना है उसे समोसा खाना ही पड़ेगा.  ये देश साधू संतों बाबा जी का भी है. बाबा जी भी कहते थे, समोसा के साथ हरी चटनी खाओ. अब हरी चटनी तो समोसा के साथ ही खायी जा सकती है. पिज्जा के साथ तो लाल चलती, टोमेटो की चटनी मिलती है, पिज्जा विदेशी है, हम उसका विरोध करेंगे…. एक साँस में इतना लम्बा भाषण देने के कारम उपाध्यक्ष महोदय को खाँसी आ गयी, वो रुक कर पानी पिने लगे.
उपाध्यक्ष महोदय को चुप होता देख कर अध्यक्ष महोदय भाषण देना शुरू कर दिए , अगर इस देश में कोई पिज्जा दिख गया तो हम उसके टुकडे टुकड़े कर देंगे. उनसे पूछा गया की पिज्जा के कितने टुकड़े करेंगे? उन्होंने अनाप स्नेप डॉट कॉम के पत्रकार ख्याली बाबा को बताया की कम से कम बोटी बोटी तो कर ही देंगे, मगर हमें हिंसा पसंद नहीं है. अध्यक्ष महोदय को जब बताया गया की पिज्जा पहले से ही आठ टुकड़ों में आता है तो अध्यक्ष महोदय बोल पड़े, हम उस व्यक्ति को जरुर सम्मानित करेंगे जो पिज्जा के आठ टुकड़े कर डालता है.
तब तक उपाध्यक्ष महोदय ने पानी पि लिया था, वो फिर से नारा लगाने लगे , अगर देश में रहना है तो समोसा खाना पड़ेगा, नहीं तो देश से जाना पड़ेगा…

Sabhar : AnapSnap.com
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Friday, April 15, 2016

इंडिया और वेस्ट इंडीज में होगा दुबारा से सेमीफाइनल.

 April 15, 2016     No comments   


31 मार्च को हुए इंडिया और वेस्ट इंडीज के बिच क्रिकेट मैच में इंडिया की बुरी तरह से हार हुई थी और वेस्ट इंडीज फाइनल में पहुँच गया था. इस हार से भारतियों को जितनी निराशा हुई उतनी किसी और को नहीं हुई होगी.
wi-vs-indलेकिन इस निराशा के बिच आशा की एक किरण नजर आ रही है. खबर है की इंडिया और वेस्ट इंडीज के बिच दुबारा से सेमी फाइनल मैच खेला जाएगा और इसका विजेता ही फाइनल में स्थान पायेगा.
क्रिकेट के इतिहास में ये पहला मौका होगा, जब एक खेले जा चुके मैच को रद्द कर के उसे दुबारा से खेला जायेगा. मैच को किस कारण रद्द किया गया है, इसकी पुख्ता जानकारी तो किसी को नहीं मिली है. मगर क्रिकेट के गलियारों में खबर है की, मैच को रद्द होने के पीछे गेल का हाथ है. उन्होंने ये इल्जाम लगाया की बुमराह को इतनी अच्छी बोलिंग करने की क्या जरुरत थी की मैं सिर्फ पाँच रन बना कर ही आउट हो गया.
😉वहीँ कुछ लोगो का कहना है की गेल को डांस करने का नहीं मौका मिलने के कारण उन्होंने इस मैच को रद्द करने की माँग की है, जिसे ICC वालों ने मान भी लिया है. गेल, इंडिया की जीत पर डांस करना चाहते थे, इसके लिए उन्होंने बाकायदा दो दिनों की ट्रेनिंग एंड पाँच दिनों की प्रैक्टिस भी की थी, उनके इतने मेहनत पर पानी फिर जाने के कारण वो गुस्से में हैं. गेल ने धोनी को व्हाट्स एप्प पर मैसेज भी किया है. उतना रन बनाने के बाद हारने की जरुरत क्या थी? अब मैं डांस कैसे करूँ? धोनी ने भी गेल के दुःख को समझते हुए ICC से गुहार लगायी है की वो इस मैच को दुबारा से करवायें और ICC वालों ने धोनी की भी बात मान ली है.
तो इस प्रकार इस टी 20 के इस सेमीफाइनल मैच को दुबारा से कराने का फैसला किया गया है. जो एक बहुत ही खुश कर देने वाली खबर है. लेकिन बहुत से लोग इस खबर को पढ़ कर झंड भी हो जायेंगे जब उन्हें पता लगेगा की आज पहली अप्रैल है.
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April 1, 2016 · by Anap Snap · in अनाप सनाप, Fun Zone. ·
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नारीवाद

 April 15, 2016     No comments   

😀महिला सशक्तिकरण से हम क्या समझते हैं.. ‘सशक्तिकरण’ से तात्पर्य किसी व्यक्ति की उस क्षमता से है जिससे उसमें ये योग्यता आ जाती है जिसमें वो अपने जीवन से जुड़े सभी निर्णय स्वयं ले सके। अपनी निजी स्वतंत्रता और स्वयं के फैसले लेने के लिये महिलाओं को अधिकार देना ही महिला सशक्तिकरण है, तो इस से ये स्पष्ट होता है की हमें खुद को पुरुषों से कम नही समझना चाहिए और आज हम ये साबित भी कर चुके हैं की हम कहीं भी किसी भी तरह से पुरुषों से कम नही हैं। ये सब पढ़ कर आप लोगो को लग रहा होगा की फिर कोई नारीवाद , वीमेन एम्पावरमेंट पर भाषण देने वाली आ गयी।।
मैं ऐसा कुछ नही कहना चाहती ।। हलाकि मैं खुद एक महिला हूँ और महिला सशक्तिकरण के विरोध में तो बिलकुल नही हूँ पर जब अपने आस पास की कुछ घटनाओ को देखती हूँ तो मन विचलित हो जाता है और यह ख्याल आता है की क्या यही है बस नारीवाद, वीमेन एम्पावरमेंट.. क्या यही वो अधिकार हैं जिन के लिए नारी सदियों से लड़ रही है। क्या पार्टीज में लेट नाईट रुकना, शराब पीना, गाली गलौच करना, कहीं भी अपने पुरुष मित्रों के साथ इंटिमेट होना, बड़ों की इज़्ज़त ना करना, क्या यही सब वो अधिकार हैं जो हमें चाहिए थे समाज से।
जो कानून हमारी सुरक्षा के लिए बनाये गए हैं उनका गलत इस्तेमाल करना, अपने जरा देर के गुस्से और अहंकार को शांत करने के लिए किसी लड़के की ज़िन्दगी बर्बाद करना उस उलटे सीधे आरोप लगाना,

Image from Net
misuse498aशादी में तनाव हो तो पति और पति के परिवार के खिलाफ धारा 498ए के तहत शिकायत दर्ज करा दी जाती है और परिवार के खिलाफ फौरन गैर जमानती वारंट जारी हो जाता है, क्या यही सब वो अधिकार हैं जिन के ये महिला सशक्तिकरण और नारीवाद जैसे बड़े बड़े शब्दों का इस्तेमाल होता है।।
क्या वाकई आज की महिलाएं सही मायने समझती है महिला सशक्तिकरण के.. खुद को पुरुषों के बराबर मानिए पर उनसे बराबरी करने के लिए ये जरुरी नही की आप उनकी हर अच्छी बुरी आदतों को अपनाये।
जब भी हम किसी पब्लिक ट्रांसपोर्ट में सफ़र करते हैं तो हमेशा लड़कों की तरफ देखा जाता है की वो अपनी सीट किसी बुजुर्ग या जरूरतमंद को दे दें। क्या युवा लड़कियों से ऐसी अपेक्षा नही रखी जा सकती। जब बराबरी का दर्जा मिला है तो क्या हमारा फ़र्ज़ नही की हम भी अपने व्यवहार में बदलाव लाये और जिस बर्ताव और व्यवहार की अपेक्षा हम पुरुषों से रखते हैं उस पर हम खुद भी अमल करें।।
अंत में मैं यही कहूँगी की सभी महिलाएं इन अधिकारों का गलत फायदा नही उठा रहीं है और ना ही महिला सशक्तिकरण गलत है।। मैं भी एक महिला हूँ और जानती हूँ की अब भी कई जगहों पर महिलाओ के साथ उचित व्यवहार नही किया जाता और उन्हें वो अधिकार नही दिए जाते जिन के लिए वो हर तरह से योग्य हैं उन को जरुरत है बदलाव की नयी सोच की पर जो मैंने यहाँ व्यक्त किया है वो कहानी का दूसरा पहलु है। आशा है की मैं अपनी बात सही तरीके से आप तक पहुंचा पायी हूँ।


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Sabhar : AnapSnap.com
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कराँची के आतंक निरोधक कोर्ट के मासूम जज ने पूछा ग्रेनेड कैसे फटता है? जबाब था – ऐसे

 April 15, 2016     No comments   


http://resources2.news.com.au/images/2011/11/25/1226206/163042-hand-grenade.jpgपाकिस्तान में आतंक निरोधक कोर्ट में जो जज साहब है, वो इतने मासूम हैं की उन्हें पता ही नहीं था की अगर पिन निकाल दिया जाय तो ग्रेनेड फट पड़ेगा. अरे भाई साब इतना तो हमारे देश का बच्चा बच्चा भी जानता है, फिल्मों में देख कर. की सरहद पार से जो आतंकवादी आते हैं जो कैसे ग्रेनेड फोड़ते हैं. अरे साहब आप भी हिंदी फिल्म देखना शुरू कर दीजिये. या आपने यहाँ फिल्मे नहीं बनती क्या जिसमे ग्रेनेड फेंका वेंका जाता हो? वैसे आपके यहाँ से तो असली वाले ग्रेनेड फेंके जाते हैं ना तो फिल्मों में नकली ग्रेनेड फेंकते देख कर उतना मज़ा नहीं आता होगा?

मामला कराँची का है.. जब वहाँ के आतंक निरोधक कोर्ट में जज से पुलिस से पूछा की की हैंड ग्रेनेड कैसे फटता है? और पुलिस ने ग्रेनेड का पिन निकाल कर दिखाया की ऐसे फटता है. और उसके बाद वाकई में ग्रेनेड फट पड़ा. जिसमे कई लोग घायल हो गये.  
वो तो शुक्र है की पाकिस्तान अपने हथियार चाइना से खरीदता है, अन्यथा कोर्ट में जो ग्रेनेड फटा था अगर चाइना का माल नहीं होता तो अपने साथ साथ कई लोगो को ले जाता . चाइना माल को भले ही कई लोग कोसते हो या मजाक उड़ाते हो, मगर इस हादसे में जिनकी जान बच गयी है, जो तो चाइना माल को धन्यबाद ही दे रहे होंगे. चाइना माल जिंदाबाद के नारे लगा रहे होंगे.
हम तो ये सोंच रहे हैं की ग्रेनेड कैसे फटता है की जगह जज साहब के सामने दुसरे केस आते तो वो कैसे फैसला सुनाते, क्या वो अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए ऐसे और भी सवाल करते? तलाक का केस आने पर, पूछते तलाक कैसे होता है? पुलिस वाले भाई साब बताते, तलाक-तलाक-तलाक, ऐसे होता है तलाक. ऐसे होता है बताने के चक्कर में पुलिस वाले का वैसे ही तलाक हो जाता, जज साहब को फैसला सुनाने का भी मौका नहीं मिलता. बलात्कार का केस आने पर, बलात्कार कैसे होता है? ये भी पूछ सकते हैं पाकिस्तान के जज.
पाकिस्तान है, वहाँ कुछ भी हो सकता है. सब ऊपरवाले के भरोसे तो चल रहा है.

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Sabhar : AnapSnap.com

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Tuesday, January 19, 2016

मैं ना दिल की बात करता हूँ, ना मन की बात करता हूँ, मैं पेट की बात करता हूँ.

 January 19, 2016     bihar, dil ki baat, labor, labour, man ki baat, migrant, narendra modi, shatrughan sinha     No comments   


मैं ना दिल की बात करता हूँ, ना मन की बात करता हूँ, मैं पेट की बात करता हूँ. 

मैं पेट की आग बुझाने के लिए भटकता हूँ देश के कोने होने में, जहाँ लगता है की मिल जाएगी मुझे दो रोटी. एक मेरे लिए एक घर वालों के लिए, जो इन्तजार में रहते हैं की आएगी इक रोटी दूर देश से. उस रोटी को खाकर वो खुद को तैयार करते हैं दो रोटी की तलाश में निकल पड़ने की. एक खुद खाने के लिए दूसरी घर भेजने लिए. अनवरत चलता रहा है, शायद चलता भी रहेगा यही क्रम…. Read More
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