ये भी ठीक ही है

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Tuesday, October 19, 2010

दहले पे नहला !!

 October 19, 2010     dahale pe nahala, manoranjan, manoranjan shriavstav, manu mania, manu shrivastav, manu srijan, short story, दहले पे नहला     1 comment   

वो उस दिन बहुत जल्दी में था . तेजी से चला जा रहा था. पर देखने वाले उसे देख के समझ रहे थे की वो दौड़ रहा है. पर उसे तो अपने लक्ष्य पर पहुचने का ध्यान था, लोग क्या देख रहे हैं, सोच रहें हैं, इसपे ध्यान देने की जरुरत भी नहीं थी उसे. 

पाँव जितने तेज चल रहे थे, उससे तेज तेज चल रही थी उसकी सोच. 


सोच, सबसे तेज चलती है. पल में चाँद पे , पल में धरती पे फैली चांदनी पे .


सोच रहा था, आज देर न हो जाये ऑफिस पहुचने में. भागा जा रहा था. कल रात ने समय पे सो गया रहता तो आज देर से नींद ना खुलती. और अभी भागना ना पडता.  ऑफिस भी पास नहीं है, मेट्रो ट्रेन के बाद बस भी पकड़ना होगा . भला हो मेट्रो का को इसमें ट्राफिक जाम नहीं होता है.

मेट्रो स्टेशन पहुँच के ही साँस ली हो मानो उसने, एक लम्बी साँस. मेट्रो रेल में चड़ने के बाद ली थी उसने दूसरी साँस. उसने लम्बी साँस ली है ये उसे तब पता लगा जब सामने वाले ने टोका - "भाई ! आराम से साँस ले लो."

सोचा की बोलूं,  "सॉरी". पर बोला नहीं की . कही फिर लम्बी साँस ना छुट जाये.
नियत स्टेशन से बाहर निकल के बस स्टैंड के तरफ भागा.बसें कड़ी थी कतार में . सारे बस वाले चिल्ला ये पहले जाएगी, ये पहले जाएगी.


एक खाली वाले ने उसे टोका  - भाई साब ये बस पहले जाएगी .
उसने खाली बस देख के कहा - नहीं भाई मुझे आज देर से जाना. 
बस वाले ने सुर बदला - अरे ! भाई तो बैठो ना , खाली बस है भर के जाएगी देर तो होगा ही. 
उसने भी नहले पे दहला मारा - नहीं ! भाई मुझे आज जल्दी जाना है देर हो रही है.
उसने हड़बड़ी में गड़बड़ी होने से बचा लिया था. 





 
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1 comment:

  1. RunnuOctober 20, 2010 at 1:30 AM

    achcha prayas hai..........good :)

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