फेसबुक पे एक ग्रुप में चर्चा करते हुए , मेरे मन में एक सवाल आया की क्या मानवता की भी कोई सीमा होता है?
क्या मानवता भी क्षेत्रवादी होती है? मानवता को अंग्रेजी में Humanity कहते हैं.. मुझे ह्युमनीटी इसलिए लिखना पड़ रहा है क्यों की ह्युमनीटी शब्द ज्यादा प्रचलित है.
दो अलग अलग, मगर एक सामान घटनाओं पे उक्त महिला की मानवता अलग अलग थी. एक पे शुष्क तो दुसरे पे व्यथित.
पहली घटना थी,दिल्ली में बाबा राम देव के पंडाल में पुलिस द्वारा निर्दोष जनता पे लाठी चार्ज .
दूसरी घटना थी, बिहार के फारबिसगंज में पुलिस द्वारा निर्दोष जनता पे लाठी चार्ज .
घटनाये दोनों एक जैसी हैं, पर उन महिला की भावनाएं अलग अलग थी.
दूसरी घटना को वो अमानवीय करार दे रही थी, पुलिस की अमानवीय करवाई करार दे रही है थी. तर्क ये था, की पुलिस महिलाओ और बच्चो को बड़े बेहरमी से पिट रही थी, सही तर्क था. इतनी बेरहमी से तो यहाँ जानवरों को भी नहीं पीटने का कानून है यहाँ.
मगर पहली घटना पर उनके विचार थे की दिल्ली के रामलीला मैदान का आन्दोलन ढोंग था.
सवाल ढोंग का नहीं है, सवाल है, यहाँ भी पुलिस के अमानवीय व्यव्हार का. यहाँ पे भी पुलिस ने लोगो को जानवरों सा पिटा, कई घायल हुए, कइयो की हालत इतनी नाजुक थी की उनको आई सी यु में भर्ती किया गया . इक्यावन बर्सिया राज बाला की हालत, आज दस दिन बाद भी नाजुक है. वो कोमा में हैं. इस घटना से उन महिला को कोई सहानुभूति नहीं थी.
ये कैसी मानवता है? जो क्षेत्रवादी है. शर्म आती है ऐसी मानवता पे .
mera ti manana hai marna kahin bhi sahi nahi tha .karan koi bhi ho pisati nirdosh janta hi hai
ReplyDeleterachana
बिलकुल सही कहा, बहुत शर्मनाक बात है !
ReplyDeleteश्रीवास्तव जी । यह ऐसी ही मानवता है जो सदियों से चली आरही है। अभी अभी आपने एक समाचार सुना होगा एक साधु अनशन करते करते मर गया ,लोगों को मरजाने के बाद पता चला
ReplyDeleteपुलिस तो केवल आदेश पर कार्य करती है . कम से कम बाबा रामदेव के मामले में ऐसा कह सहकते है.
ReplyDeleteअपना अपना नजरिया है,
ReplyDeleteविवेक जैन vivj2000.blogspot.com
बहरहाल मानवता को किसी परिधि में नहीं बंधा जा सकता...... हम तो पहली बार आपके ब्लॉग पर आये....... बहुत प्रभावशाली ब्लॉग है आपका. यह प्रस्तुति बहुत सुन्दर और प्रेरणा देने वाली है.
ReplyDeleteजिस जगह उन्होंने मानवता दिखाई , वो उनकी 'राजनीतिक' मानवता है । सच्ची नहीं। शायद घडियाली आँसू।
ReplyDeleteमानवता भी राजनीती के वश में है आजकल पहचानना मुश्किल है...
ReplyDeleteजिस तरह की मानवता दिखाई गयी और जो नहीं दिखाई गयी .....दोनों ही जगह स्वार्थपरक सोच हावी है...... जहाँ जिस में फायदा हो वही किया जाय...... पोस्ट का प्रश्न एकदम सटीक और समसामयिक है......
ReplyDeleteबढिया है
ReplyDeleteसचमुच, शर्मनाक है यह सब।
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