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Friday, May 13, 2011

आज इतनी सुबह कैसे ?

 May 13, 2011     diary, manoranjan shrivastav, manu shrivastav, manu srijan     1 comment   

सुबह की हवा कितनी ताज़गी देती है इसका अहसास तभी होता है जब ताज़ी हवा के झोके चेहरे पे आ लगते हैं | मन कितना आनंदित होता है, अपने बालकोनी में सुबह की ताज़ी हवा का आनद लेते हुए मन में कुछ ऐसे ही ख्यालात उमड़ रहे थे | 

हल्का अँधेरा जो की जा चूका था, सूरज कहीं  दिखाई तो नहीं दे रहा था, पर चारो तरफ उजाले का साम्राज्य कायम हो चूका था |  चिडियों की चुन चुन बड़े ही मनोहारी लग रहे थे | फिर लगा ऐसे की अभी बगल से कोई कंधे पे हल रखे , अपने बैल के गले की घंटी टुनटुनाते हुए निचे से गुजरेगा | पर कोई नहीं गुजरा | ध्यान आया मैं गाव में नहीं शहर में हूँ  | पर शायद  ख्यालों को नहीं पता थी ये बात |  

सर उपर उठा के देखा तो बादल भागे जा रहे थे, शहर के बादल भी भागमभाग के आदि हो चुके थे | उन्हें भी शायद अपने ऑफिस समय पे पहुचना था | उन्हें भी डर था की अगर टाइम पे नहीं पहुँचे तो एक या दो मिनट की देरी से ही हाफ डे न लग जाये | 

बादल भी कई तरह के थे, काले, सफ़ेद भूरे, पूरब की तरफ के बादल तो लाल लाल अंगारे जैसे लग रहे थे | जैसे लोहे को भट्ठी में तपाया गया हो |  मैं उन्हें देख के सोच में पड़ गया की ये गुस्से में लाल हैं या शर्म से लाल हो रहे हैं| तभी उनके पीछे से सूरज ने झाँका | अब जाके बादलों के लालिमा का कारण समझ में आया | वे सूरज की किरणों की वजह से लाल दिखाई दे रहे थे | 

खैर, अगर आप ये पूछोगे की देर सुबह तक जगने वाला आज इतनी सुबह कैसे जग गया ? तो मैं यही कहूँगा की आज मैं देर तक जाग रहा  हूँ !


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1 comment:

  1. manu shrivastavMay 14, 2011 at 11:03 AM

    mere mitra abhishek ranjan jinhone personally email kar ke mujhe kuchh sujhaya hai, main unka aabhari hu


    आज इतनी सुबह कैसे ? mast likhe h.......bs mann kiya ki bol dun......kuch jayada hin sanchep me h......thora vistar ki zarurat h.......aur kuch jagah nhi likhna jayada kuch kah deta h......mujhe laga ki "अब जाके बादलों के लालिमा का कारण समझ में आया | वे सूरज की किरणों की वजह से लाल दिखाई दे रहे थे | "iss pure lyn ko ager aap kuch chayawaad me likhte ya nhi likhte to mujhe jayada accha lagta.....ye sirf meri apni soch h.... plz dont mind......

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