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Saturday, May 28, 2011

काँच और दिल टूटने में फर्क !

 May 28, 2011     kanch aur dil tutane me fark. poem, manu shrivastav, manu srijan     No comments   

छन्न से टूट के बिखर गया, ग्लास काँच का,
कई टुकड़ो में ,
कुछ बड़े , कुछ छोटे, कुछ महीन,
जरुरी हो गया उन्हें,
उठा के कूड़े में फेंकना,
क्या पता?
चुभ न जाये किसी के पैरो में !

चुन चुन के उठा लिया,
हर बड़े  छोटे टुकडे को,
पर महीन टुकडे अभी बाकि हैं उठाने,
धीरे धीरे सावधानी पूर्वक उठाने लगा था मैं,
सतर्क होने के बावजूद भी चुभ ही गया, कमबख्त,
चुभन का दर्द रेंग गया उंगली के छोर तक.

फेंकते हुए काँच को ख्याल आया एक बार,
"एक टुटा तो क्या हुआ ? 
अभी पूरा 'सेट' तो सुरक्षित है| "

काँच और दिल टूटने में सिर्फ इतना फर्क है "मनु",
"दिल का कोई सेट नहीं होता !"
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