छन्न से टूट के बिखर गया, ग्लास काँच का,
कई टुकड़ो में ,
कुछ बड़े , कुछ छोटे, कुछ महीन,
जरुरी हो गया उन्हें,
उठा के कूड़े में फेंकना,
क्या पता?
चुभ न जाये किसी के पैरो में !
चुन चुन के उठा लिया,
हर बड़े छोटे टुकडे को,
पर महीन टुकडे अभी बाकि हैं उठाने,
धीरे धीरे सावधानी पूर्वक उठाने लगा था मैं,
सतर्क होने के बावजूद भी चुभ ही गया, कमबख्त,
चुभन का दर्द रेंग गया उंगली के छोर तक.
फेंकते हुए काँच को ख्याल आया एक बार,
"एक टुटा तो क्या हुआ ?
अभी पूरा 'सेट' तो सुरक्षित है| "
काँच और दिल टूटने में सिर्फ इतना फर्क है "मनु",
"दिल का कोई सेट नहीं होता !"
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