जब तुम चली गयी तो अहसास हुआ,
कि कितना हृदय विहीन हूँ मैं,
सारे दिन के मेहनत के बाद तुमसे,
ये नहीं पूछा कि थक गई होगी,
लाओ तुम्हारी कुछ मदद कर दूँ !
उलटे तुमको कुछ और काम दे दिया,
तुमने कुछ नहीं कहा,
पर तुम्हारे दिल में ये वेदना तो हुई ही होगी,
सोचा तो होगा ही तुमने कि कितना हृदय विहीन हो तुम,
पर तुमने कहा कुछ नहीं
बस चुप रही !
तुम्हारी चुप्पी को मैंने हाँ समझा,
पर नहीं समझा, तो उसके अन्दर कि वेदना,
समझता भी कैसे,
कितना ह्रदय विहीन हो गया हूँ मैं !
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