पर डरता हूँ ज़माने से,
मैं कुछ भी कर सकता हूँ.
पर डरता हूँ बताने से .
क्या पता कहीं तुम्हारा भाई , पहलवान होपीछे पड़ जाये मेरी जान कोवो आके मुझसे कुश्ती लड़ने लगेऔर मैं पुकारने लगूँ भगवान को
तुम्हारे पिता जी देखने में ही खूसट लगते हैं,
हर वक़्त मुझे घूरते रहते हैं,
मैं कौन हूँ? क्या करता हूँ?
हर किसी से पूछते रहते हैं.तुम्हरी माँ मुझे मुझे बहुत अच्छी लगती है,
कुछ नहीं कहती है,
पर एक कमी उसकी मुझे खलती है,
कहीं नहीं जाती वो , घर में ही रहती है
(तुमसे मिलाने नहीं आ पता हूँ !)
जब मियां बीवी राज़ी
तो क्या करेंगे पिताजी , माता जी
मैंने उन दोनों को समझाया
और प्यार से बताया
शादी तो मैं आपकी बेटी से ही करूँगा
दहेज़ में कुछ ज्यादा नहीं चाहिए
टीवी कार फ्रिज तो सही देते हैं
इसके अलावा दो चार लाख रूपया चाहिए
दहेज़ जैसी कुप्रथा आज भी
देश में चल रही है,
यही वो कारण है जिससे आज भी
बहुत सी औरतें जल रही हैं.
दानव कभी मानव नहीं बन सकता,
ReplyDeleteदहेज के असली लोभी कभी सुधर नहीं सकते?
प्रभावित करती सशक्त रचना ..... प्रासंगिक भाव
ReplyDeleteबेहतरीन और प्रासंगिक रचना
ReplyDeleteअच्छी रचना..
ReplyDeleteशुभकामनाएं.
bahut khoob...
ReplyDeleteआज भी दहेज़ का दानव मुह फाड़े खड़ा है ......अच्छी रचना बहुत खूब
ReplyDeleteक्या बात है मनु भाई.उनकी माता जी आपको अच्छी लगीं यह एक सुखद पहलु है.पटाने में आप माहिर हैं,बात बन ही जानी चाहिये.
ReplyDeleteप्यार की बोलियेगा बोली
दहेज को मारियेगा गोली,
बस प्यार से ही भर लीजियेगा अपनी झोली.
आपकी,उनकी,उनके भाई,माता,पिता सभी की बन जायेगी टोली.
टोली बनने की खुशी में हमें निमंत्रण देना न भूलिएगा.
सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार.
........प्रशंसनीय रचना - बधाई
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