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Friday, July 29, 2011

लटों का लहराना

 July 29, 2011     hindi poem, kavita, manu shrivastav, manu srijan, manushrivastav, poem     2 comments   

उन लहराते लटो को,
 जब झटकती हो अपने चेहरे से,
तो सोचती होगी शायद तुम,
 "कम्बख्त, आ जाते हैं,
 बार बार चेहरे के आगे." 
पर लटों को भी,
लहराना अच्छा लगता होगा,
मना करने पे भी कोई बात न माने,
यूँ ही नहीं होता . 
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2 comments:

  1. Rakesh KumarJuly 29, 2011 at 11:13 AM

    मनु जी लगता है आप लटों में ही उलझ कर रह गए हैं.

    ReplyDelete
    Replies
      Reply
  2. sushma 'आहुति'July 29, 2011 at 11:33 PM

    sunder...

    ReplyDelete
    Replies
      Reply
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