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Thursday, July 21, 2011

सूरज चाचू.

 July 21, 2011     kavita, manu srijan, manushrivastav, poem     2 comments   

चलते चलते थक गए,
शाम ढली तो रुका गए,
थोडा सा कर लो विश्राम, 
कल से फिर करना काम 
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2 comments:

  1. Rakesh KumarJuly 21, 2011 at 3:21 AM

    धन्यवाद मनु भतीजे.

    मुझे कहाँ विश्राम
    आपके यहाँ शाम,
    तो कहीं और फिरसे सुबह करके
    मुझे तो करते ही रहना है काम
    हाँ,रात में आप जरूर विश्राम करलें,
    सुबह होने पर फिर मेरे दर्शन करलें.

    बहुत बहुत आभार.

    ReplyDelete
    Replies
      Reply
  2. manu shrivastavJuly 25, 2011 at 11:38 AM

    धन्यबाद राकेश जी ,
    आपके निरंतर प्रोत्साहन के लिए.

    ReplyDelete
    Replies
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