अपना सर्वस्व लुटा कर,
उनकी जरुरत को पूरा करते ही आयें हैं हम,
सदियों से, पीढ़ी दर पीढ़ी |
परमार्थ हित में,
अपने जीवन की,
आहुति देने के लिए हीं,
वजूद में आता है,
अस्तित्व हमारा |
एक वीर की तरह,
हँसते हँसते,
बलि की वेदी पे चढ़ जाना,
फितरत है हमारी |
हाँ ! बलि की वेदी पे चढ़ जाना,
फितरत है हमारी |
ये जानते हुए भी,
आहुति देने के लिए हीं,
जीवन मिला है हमे,
कोई विरला ही,
बार बार,
जन्म लेना चाहेगा|
एक एक करके,
जान न्योछावर कर दी,
मेरे सरे दोस्तों ने,
सगे सम्बन्धियों ने,
पर क्या?
मेरी किस्मत में शहीद कहलाना नहीं बदा हैं?
आठ पहर हो गए,
उसने मेरी शकल तक नहीं देखी|
कोई ऐसे करता है क्या?
तिरस्कार,
एक उबले हुए अंडे का !
बहुत गूढ भाव व्यक्त किये हैं आपने।
ReplyDeleteफिरभी बधाई तो स्वीकारें ही, इस सुंदर प्रस्तुति के लिए।
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गुडिया रानी हुई सयानी..
सीधे सच्चे लोग सदा दिल में उतर जाते हैं।
:) Badi alag si rachna ...sunder prastutikaran
ReplyDeletedhanyabaad aap logo ka, is hausala afjai ka!
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