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Saturday, May 28, 2011

अंडात्मा का रुदन !

 May 28, 2011     andatma ka rudan, hasya, hindi poem, kavita, manu shrivastav, manu srijan     3 comments   

अपना सर्वस्व लुटा कर,
उनकी जरुरत को पूरा करते ही आयें हैं हम,
सदियों से, पीढ़ी दर पीढ़ी |
परमार्थ हित में,
अपने जीवन की,
आहुति देने के लिए हीं,
वजूद में आता है,
अस्तित्व हमारा |

एक वीर की तरह,
हँसते हँसते,
बलि की वेदी पे चढ़ जाना,
फितरत है हमारी |

हाँ ! बलि की वेदी पे चढ़ जाना, 
फितरत है हमारी |
ये जानते हुए भी,
आहुति देने के लिए हीं,
जीवन मिला है हमे,
कोई विरला ही,
बार बार,
जन्म लेना चाहेगा|

एक एक करके,
जान न्योछावर कर दी,
मेरे सरे दोस्तों ने,
सगे सम्बन्धियों ने,

पर क्या?
मेरी किस्मत में शहीद कहलाना नहीं बदा हैं?
आठ पहर हो गए,
उसने मेरी शकल तक नहीं देखी|
कोई ऐसे करता है क्या?
तिरस्कार,
एक उबले हुए अंडे का !


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3 comments:

  1. ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Zakir Ali 'Rajnish')May 28, 2011 at 9:40 PM

    बहुत गूढ भाव व्‍यक्‍त किये हैं आपने।

    फिरभी बधाई तो स्‍वीकारें ही, इस सुंदर प्रस्‍तुति के लिए।

    ---------
    गुडिया रानी हुई सयानी..
    सीधे सच्‍चे लोग सदा दिल में उतर जाते हैं।

    ReplyDelete
    Replies
      Reply
  2. डॉ॰ मोनिका शर्माMay 28, 2011 at 9:52 PM

    :) Badi alag si rachna ...sunder prastutikaran

    ReplyDelete
    Replies
      Reply
  3. manu shrivastavMay 29, 2011 at 7:13 AM

    dhanyabaad aap logo ka, is hausala afjai ka!

    ReplyDelete
    Replies
      Reply
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