चंद्रकांता पढ़ रहा हूँ. जिसे बाबु देवकी नंदन खत्री ने सन 1888 में लिखा था.
कहते हैं हिंदी में लिखे इस उपन्यास को पढ़ने के लिए लोगो ने हिंदी सिखाना शुरू किया, तब जब उर्दू और फारसी का वर्चस्व था . बचपन में माँ से चंद्रकांता और चंद्रकांता संतति की कहानी सुनी थी. माँ ने बताया था की उसने अपने स्कूल के दिनों में ये उपन्यास पढ़ा था.
जैसे जैसे उपन्यास आगे पढ़ते जा रहा हूँ, एक एक लाइन याद आ रहा है . जो माँ ने सुनाया था. और माँ ने एक एक लाइन सुनाया था जो उन्होंने अपने स्कुल के दिनों में पढ़ा था. ऐसा लग रहा है.
इस घटना प्रधान उपन्यास में एक के बाद एक होती घटनाये इतनी मजेदार हैं की एक बैठक में पूरा उपन्यास ख़तम करने की इच्छा हो रही है.
घात प्रतिघात , चालाकी , धोखा , मक्कारी, दोस्ती, दुश्मनी, मुहब्बत , वफ़ादारी, त्याग क्या नहीं है इसमें !
भले ही इस उपन्यास के नायक और नायिका , बिरेन्द्र सिंह और चंद्रकांता हो, पर यह उपन्यास है ,ऐयारो (जासूस) , की. ऐयारो के कारनामो की . एक ऐयार अपने काम से दो राज्य को लडवा भी सकता था, और लड़ाई बंद भी करवा सकता था, बिना लड़ाई करे दुश्मन राज्य पे फतह भी हासिल कर सकता था.
इस रोमांचक घटनाप्रधान , जासूसी उपन्यास पढ़ के मैं ये सोच रहा हूँ की हम क्यों विदेशी लेखको उपन्यास के पीछे इतना भागते हैं जब की हमारे गागर ही मोतियों से भरे पड़े हैं.
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ReplyDeleteमनु जी ,
मुझे बहुत अफ़सोस होता है जब कुछ लोगों को कोट करते देखती हूँ , विदेशी लेखकों के वक्तव्य । हमारा हिंदी साहित्य ही इतना समृद्ध है की कहीं और सुख ढूँढने की कल्पना भी व्यर्थ है।
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बिलकुल आपसे सहमत। शुभकामनायें।
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ReplyDeleteसहमत हूँ......हमारे यहाँ कहाँ कमी है....
ReplyDeleteदेवकीनंदन खत्री का महान उपन्यास 'चंद्रकांता' और 'भूतनाथ'मुफ्त डाउनलोड के लिए 'अपनी हिंदी' पर उपलब्ध है.
ReplyDeletewww.apnihindi.com